आज जब भी भारतीय संगीत को ग्लोबल मंच पर पेश करने की बात आती है, तो जुबां पर सबसे पहला नाम ए.आर. रहमान का ही आता है। सोशल मीडिया के दौर में जहां ट्रेंड्स हर पल बदलते हैं, वहां रहमान का जादू नब्बे के दशक से लेकर आज की जेन-जी पीढ़ी तक सिर चढ़कर बोल रहा है। चाहे वह स्लमडॉग मिलियनेयर का 'जय हो' हो या आज की फिल्मों के आधुनिक ट्रैक, रहमान सिर्फ एक नाम नहीं बल्कि एक ऐसा इमोशन बन चुके हैं जो हर उम्र के लोगों को आपस में जोड़ता है। आज हर तरफ उन्हीं की चर्चा है क्योंकि उन्होंने न केवल ऑस्कर और ग्रैमी जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर तिरंगा लहराया है, बल्कि संगीत को देखने और सुनने का नजरिया ही बदल दिया है।

चेन्नई की गलियों से निकलकर ग्लोबल आइकन बनने तक का उनका सफर किसी रोमांचक फिल्मी कहानी जैसा है। उनका असली नाम दिलीप कुमार था, लेकिन छोटी उम्र में ही पिता के गुजर जाने के बाद उनकी जिंदगी में काफी उतार-चढ़ाव आए। घर की जिम्मेदारी और आर्थिक तंगी के कारण उन्हें पढ़ाई तक छोड़नी पड़ी, मगर यही वो दौर था जब उनके हाथों ने कीबोर्ड और सिंथेसाइज़र के साथ अपनी किस्मत लिखनी शुरू की। महज ग्यारह साल की उम्र में उन्होंने बड़े म्यूजिक डायरेक्टर्स के साथ काम करना शुरू किया और अपने कठिन परिश्रम से यह साबित कर दिया कि प्रतिभा किसी उम्र की मोहताज नहीं होती।

साल 1992 में फिल्म 'रोजा' के साथ उन्होंने अपना धमाकेदार डेब्यू किया और पहली ही फिल्म से पूरी इंडस्ट्री के साउंड को बदलकर रख दिया। डायरेक्टर मणिरत्नम के साथ उनकी इस जोड़ी ने संगीत की एक नई भाषा पेश की, जो पहले कभी नहीं सुनी गई थी। इसके बाद 'बॉम्बे', 'दिल से', 'ताल', 'लगान' और 'रंग दे बसंती' जैसे प्रोजेक्ट्स के जरिए उन्होंने ऐसा संगीत दिया जिसे लोगों ने केवल कानों से सुना नहीं, बल्कि रूह से महसूस किया। उनका खास अंदाज जिसमें इंडियन क्लासिकल, सूफी और इलेक्ट्रॉनिक म्यूजिक का बेजोड़ फ्यूजन होता है, आज भी दुनिया भर के संगीतकारों के लिए एक मिसाल बना हुआ है।

रहमान की कामयाबी सिर्फ फिल्मों तक ही सीमित नहीं रही बल्कि उन्होंने 'वंदे मातरम' जैसा एल्बम देकर इसे हर भारतीय का नया देशभक्ति एंथम बना दिया। 'बॉम्बे ड्रीम्स' जैसे अंतरराष्ट्रीय प्रोजेक्ट्स और हॉलीवुड में अपनी पकड़ मजबूत कर उन्होंने भारतीय संगीत को तकनीक के मामले में भी नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया। उनके खुद के स्टूडियो 'पंचाथान रिकॉर्ड इन' ने म्यूजिक प्रोडक्शन के मायने बदल दिए। यही वजह है कि दुनिया उन्हें 'मोजार्ट ऑफ मद्रास' और 'इसई पुयल' जैसे खिताबों से नवाजती है। उनके नाम नेशनल अवॉर्ड्स, ग्रैमी, गोल्डन ग्लोब और बाफ्टा जैसे अनगिनत सम्मान दर्ज हैं, लेकिन इतनी शोहरत के बाद भी उनकी सादगी और आध्यात्मिकता ही उनकी असली ताकत है।

एक तरफ जहां वे अपने चैरिटी और म्यूजिक एजुकेशन के जरिए समाज को बेहतर बनाने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ उनका संगीत समय की सीमाओं को लांघ चुका है। आज की नई पीढ़ी भी उनके 'छैया छैया' या 'कुन फाया कुन' जैसे गानों पर उतनी ही गहराई से झूमती है जितना पुरानी पीढ़ी झूमती थी। रहमान का संगीत टाइमलेस है और यही वजह है कि जब भी उनकी कोई नई धुन रिलीज होती है, वो तुरंत वायरल हो जाती है। वे एक ऐसे कलाकार हैं जिन्होंने तकनीक और संस्कृति के मेल से एक ऐसी रिवोल्यूशन की शुरुआत की है, जो आने वाली कई सदियों तक गूंजती रहेगी।

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Pratahkal Newsroom

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