भारतीय फिल्म उद्योग में एक बार फिर थिएटर वितरण व्यवस्था को लेकर बहस तेज हो गई है, जब फिल्मकार Anurag Kashyap ने सिनेमाघरों में फिल्मों के प्रदर्शन के मौजूदा तरीके पर गंभीर सवाल उठाए हैं। कश्यप का कहना है कि वर्तमान प्रणाली में बड़े बजट और व्यावसायिक फिल्मों को अत्यधिक प्राथमिकता दी जा रही है, जबकि छोटे और स्वतंत्र सिनेमा को लगातार हाशिए पर धकेला जा रहा है।

कश्यप के अनुसार, हालात ऐसे हैं कि सीमित स्क्रीन और असुविधाजनक शो टाइम्स के कारण कई छोटी फिल्में दर्शकों तक सही तरीके से पहुंच ही नहीं पा रही हैं। उन्होंने विशेष रूप से फिल्मों Bandar और इम्तियाज अली के प्रोजेक्ट Main Vaapas Aaunga का उल्लेख करते हुए कहा कि बेहतर कंटेंट और दर्शकों की संभावित रुचि होने के बावजूद इन्हें पर्याप्त स्क्रीनिंग नहीं मिल रही है।

कश्यप ने अपने बयान में कहा कि बड़े “इवेंट फिल्मों” को थिएटरों में प्राथमिकता दी जाती है, जिससे छोटे प्रोजेक्ट्स के लिए शुरुआती दिनों में ही जगह सीमित हो जाती है। उन्होंने यह भी बताया कि छोटे बजट की फिल्मों को अक्सर सुबह के शो या बेहद सीमित स्क्रीनिंग स्लॉट्स में डाल दिया जाता है, जिससे उनका शुरुआती कलेक्शन और दर्शक पहुंच प्रभावित होती है। कई बार दर्शकों की मांग होने के बावजूद स्क्रीन आवंटन उस स्तर पर नहीं पहुंच पाता जिसकी उम्मीद की जाती है।

उन्होंने आगे कहा कि यह व्यवस्था धीरे-धीरे सिनेमा देखने के अनुभव को भी बदल रही है, जहां बड़े व्यावसायिक प्रोजेक्ट्स शुरुआती हफ्तों में अधिकांश स्क्रीन पर कब्जा कर लेते हैं। ऐसे में छोटे फिल्मकारों को अपनी फिल्मों के लिए पर्याप्त समय और अवसर नहीं मिल पाता, क्योंकि वर्ड-ऑफ-माउथ बनने से पहले ही फिल्में सिनेमाघरों से हटने लगती हैं।

इस पूरी स्थिति के पीछे उन्होंने मल्टीप्लेक्स बिजनेस मॉडल को जिम्मेदार बताया, जिसमें ओपनिंग वीक में अधिक कमाई देने वाली फिल्मों को प्राथमिकता दी जाती है। साथ ही उन्होंने यह भी संकेत दिया कि लगातार एक ही समय पर कई बड़ी फिल्मों और हॉलीवुड रिलीज़ के टकराव के कारण छोटे प्रोजेक्ट्स के लिए जगह और भी कम होती जा रही है।

कश्यप का मानना है कि इस असंतुलन के कारण दर्शकों का झुकाव भी बदल रहा है और वे धीरे-धीरे ओटीटी प्लेटफॉर्म्स की ओर बढ़ रहे हैं, क्योंकि वहां कंटेंट को ज्यादा विविधता और स्वतंत्रता मिलती है। उनके अनुसार, यह स्थिति भारतीय सिनेमाघरों के भविष्य और विविध सिनेमा की उपलब्धता दोनों पर गंभीर प्रभाव डाल सकती है। यह बयान ऐसे समय में आया है जब भारतीय फिल्म उद्योग में थिएटर बनाम ओटीटी और बड़े बजट बनाम स्वतंत्र सिनेमा को लेकर बहस लगातार तेज हो रही है। कश्यप द्वारा उठाए गए सवाल एक बार फिर इस चर्चा को केंद्र में ले आए हैं कि क्या मौजूदा वितरण प्रणाली सभी प्रकार के सिनेमा को समान अवसर देने में सक्षम है या नहीं।

Manyaa Chaudhary

Manyaa Chaudhary

यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।

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