आज जब भी हिंदी सिनेमा में रियल, रॉ और बिना फिल्टर वाली फिल्मों की बात होती है, तो सबसे पहले नाम आता है Anurag Kashyap का। सोशल मीडिया से लेकर फिल्म फेस्टिवल तक, हर जगह उनकी चर्चा होती रहती है। कभी उनकी फिल्में सेंसर बोर्ड से भिड़ जाती हैं, कभी उनके किरदार लोगों को बेचैन कर देते हैं और कभी उनका सिनेमा पूरी इंडस्ट्री की दिशा बदल देता है। “गैंग्स ऑफ वासेपुर”, “सेक्रेड गेम्स”, “ब्लैक फ्राइडे” और “देव डी” जैसी फिल्मों और सीरीज ने उन्हें सिर्फ डायरेक्टर नहीं, बल्कि एक कल्ट आइकन बना दिया। यही वजह है कि आज भी जब कोई नया फिल्ममेकर अलग तरह का सिनेमा बनाना चाहता है, तो सबसे पहले तुलना अनुराग कश्यप से ही होती है।

उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में जन्मे अनुराग कश्यप का सफर किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं रहा। साइंटिस्ट बनने का सपना लेकर दिल्ली यूनिवर्सिटी के हंसराज कॉलेज में जूलॉजी पढ़ने पहुंचे अनुराग की जिंदगी तब बदल गई, जब उन्होंने एक फिल्म फेस्टिवल में इटालियन क्लासिक “बाइसिकल थीव्स” देखी। बस उसी पल उन्होंने तय कर लिया कि जिंदगी फिल्मों को समर्पित करनी है। जेब में सिर्फ पांच हजार रुपये लेकर वह मुंबई पहुंचे, लेकिन यहां शुरुआत बेहद कठिन रही। कई रातें उन्होंने सड़कों, बीच और हॉस्टल की छतों पर गुजारीं। थिएटर किया, स्क्रिप्ट लिखी और धीरे-धीरे इंडस्ट्री में अपनी जगह बनाई। उनकी जिंदगी का पहला बड़ा ब्रेक तब आया, जब Ram Gopal Varma ने उन्हें “सत्या” लिखने का मौका दिया। इस फिल्म ने हिंदी सिनेमा की अंडरवर्ल्ड कहानियों को पूरी तरह बदलकर रख दिया।

इसके बाद अनुराग ने डायरेक्शन में कदम रखा, लेकिन शुरुआत आसान नहीं थी। उनकी पहली फिल्म “पांच” सेंसर विवादों में फंस गई और रिलीज ही नहीं हो पाई। फिर आई “ब्लैक फ्राइडे”, जो 1993 मुंबई ब्लास्ट पर आधारित थी। फिल्म को रिलीज होने में सालों लग गए, लेकिन रिलीज के बाद इसे मास्टरपीस कहा गया। “नो स्मोकिंग” बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप रही, मगर बाद में उसे कल्ट स्टेटस मिला। असली गेम चेंजर बनी “देव डी”, जिसने क्लासिक “देवदास” को मॉडर्न इंडिया की भाषा दी। इसके बाद “गुलाल” और फिर “गैंग्स ऑफ वासेपुर” ने अनुराग कश्यप को दुनिया भर में पहचान दिलाई। “गैंग्स ऑफ वासेपुर” सिर्फ फिल्म नहीं, एक कल्चर बन गई। उसके डायलॉग, किरदार और म्यूजिक आज भी इंटरनेट पर वायरल होते रहते हैं।

अनुराग कश्यप की सबसे बड़ी ताकत उनका स्टाइल है। वह ग्लैमर से ज्यादा सच्चाई दिखाते हैं। उनकी फिल्मों में छोटे शहरों की गालियां हैं, टूटे हुए लोग हैं, गुस्सा है, राजनीति है और समाज का वो चेहरा है जिसे अक्सर मेनस्ट्रीम सिनेमा छिपा देता है। हैंडहेल्ड कैमरा, रियल लोकेशन और इम्प्रोवाइज्ड डायलॉग्स उनकी पहचान बन चुके हैं। “रमन राघव 2.0”, “अग्ली”, “मुक्काबाज” और “मनमर्जियां” जैसी फिल्मों ने साबित किया कि वह हर जॉनर में एक्सपेरिमेंट कर सकते हैं। इतना ही नहीं, उन्होंने “सेक्रेड गेम्स” के जरिए ओटीटी की दुनिया में भी क्रांति ला दी। यह भारत की पहली नेटफ्लिक्स ओरिजिनल सीरीज बनी और पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बन गई।

सिर्फ डायरेक्टर ही नहीं, अनुराग कश्यप एक ऐसे प्रोड्यूसर भी हैं जिन्होंने नए टैलेंट को मौका दिया। “उड़ान”, “क्वीन”, “मसान”, “उड़ता पंजाब” और “लंचबॉक्स” जैसी फिल्मों को सपोर्ट करके उन्होंने इंडी सिनेमा को नई पहचान दी। उनकी कंपनी फैंटम फिल्म्स ने हिंदी सिनेमा को कई नए चेहरे दिए। हालांकि उनके करियर में विवाद भी कम नहीं रहे। “बॉम्बे वेलवेट” जैसी बड़ी फिल्म की असफलता ने उन्हें तोड़ दिया था और उनका ड्रीम प्रोजेक्ट “डोगा” भी कभी बन नहीं पाया। लेकिन हर गिरावट के बाद वह और ज्यादा खतरनाक तरीके से लौटे। हाल ही में तमिल फिल्म “महाराजा” में उनके निगेटिव किरदार की जमकर तारीफ हुई और इंटरनेशनल फिल्ममेकर्स तक ने उनकी एक्टिंग को नोटिस किया।

आज अनुराग कश्यप सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि हिंदी सिनेमा में बदलाव की पूरी मूवमेंट हैं। फ्रांस सरकार उन्हें “नाइट ऑफ द ऑर्डर ऑफ आर्ट्स एंड लेटर्स” सम्मान दे चुकी है, जबकि फिल्मफेयर से लेकर इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल तक उनका दबदबा बना हुआ है। वह उन चुनिंदा फिल्ममेकर्स में हैं जिन्होंने यह साबित किया कि बिना बड़े स्टार्स और फॉर्मूला फिल्मों के भी सिनेमा लोगों के दिलों में उतर सकता है। यही वजह है कि हर नई पीढ़ी का फिल्म लवर और फिल्ममेकर आज भी अनुराग कश्यप को हिंदी सिनेमा का सबसे बागी और सबसे असरदार क्रिएटर मानता है।

Pratahkal Newsroom

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