हिंदी संगीत जगत की मशहूर गायिका अनुराधा पौडवाल 27 अक्टूबर को 72 साल की हो गई हैं। पांच दशक से अधिक लंबे संगीत सफर में उन्होंने रोमांटिक गीतों से लेकर भजनों तक अपनी आवाज से अलग पहचान बनाई है। कभी प्रेम गीतों के जरिए श्रोताओं के दिलों तक पहुंचने वाली अनुराधा पौडवाल ने भक्ति संगीत में भी घर-घर तक अपनी जगह बनाई। उनकी इस यात्रा की शुरुआत एक संस्कृत श्लोक से हुई थी, जबकि वर्ष 1990 में आई फिल्म ‘आशिकी’ उनके करियर का बड़ा मोड़ साबित हुई।

27 अक्टूबर 1954 को जन्मीं अनुराधा पौडवाल आज किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं। उनके गीतों ने कई पीढ़ियों के श्रोताओं को प्रभावित किया है। पांच दशक से अधिक के इस सफर में उन्होंने फिल्मी संगीत और भक्ति संगीत, दोनों क्षेत्रों में अपनी पहचान बनाई।

अनुराधा पौडवाल के फिल्मी करियर की शुरुआत किसी रोमांटिक गीत से नहीं, बल्कि संस्कृत श्लोक से हुई थी। वर्ष 1973 में आई फिल्म ‘अभिमान’ के लिए उन्होंने शिव स्तुति ‘ओंकारं बिंदुसंयुक्तं’ की एक शुरुआती रिकॉर्डिंग की थी। संगीतकार एस. डी. बर्मन को उनकी आवाज पसंद आई। इसके बाद उनके लिए फिल्मी दुनिया में आगे बढ़ने के रास्ते खुलने लगे। उस समय शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि यह आवाज आगे चलकर करोड़ों लोगों की पसंद बन जाएगी।

वर्ष 1990 में आई फिल्म ‘आशिकी’ अनुराधा पौडवाल के करियर में निर्णायक मोड़ साबित हुई। इस फिल्म के ‘नजर के सामने’, ‘बस एक सनम चाहिए’ और ‘धीरे-धीरे से मेरी जिंदगी में आना’ जैसे गाने बेहद लोकप्रिय हुए। इसके बाद ‘दिल है कि मानता नहीं’, ‘साजन’ और ‘बेटा’ जैसी फिल्मों के गीतों ने उनकी लोकप्रियता को और बढ़ाया। फिल्म ‘बेटा’ का गाना ‘धक-धक करने लगा’ भी आज तक याद किया जाता है।

अनुराधा पौडवाल को गायन के क्षेत्र में योगदान के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और चार फिल्मफेयर पुरस्कार मिले। वर्ष 1989 में मराठी फिल्म ‘कलात नकळत’ के गीत के लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसके बाद वर्ष 2017 में भारत सरकार ने कला के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए उन्हें पद्मश्री प्रदान किया।

फिल्मी गीतों के साथ भक्ति संगीत में बनाई गई उनकी पहचान भी उनके करियर का अहम हिस्सा रही है। ‘जय अम्बे गौरी’, ‘श्री दुर्गा सप्तशती’ और माता की भेंटों जैसे भक्ति गीतों ने उन्हें घर-घर तक पहुंचाया। उन्होंने हिंदी के अलावा कई भारतीय भाषाओं में भी गाने रिकॉर्ड किए। टी-सीरीज के साथ उनके काम ने भक्ति संगीत को बड़ी संख्या में लोगों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

अनुराधा पौडवाल की निजी जिंदगी में भी कई कठिन दौर आए। वर्ष 1991 में उनके पति और संगीतकार अरुण पौडवाल का निधन हो गया। इसके बाद उन्होंने अपनी 25 दिन की बेटी को खोने का दुख भी झेला। वर्ष 2020 में उनके बेटे आदित्य पौडवाल का 35 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। इन दुखद घटनाओं के बावजूद संगीत उनके जीवन का अहम हिस्सा बना रहा।

अनुराधा पौडवाल का संगीत सफर रोमांटिक गीतों से लेकर भक्ति संगीत तक फैला है। राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार, चार फिल्मफेयर पुरस्कार और पद्मश्री से सम्मानित उनकी आवाज ने संगीत की इन दोनों विधाओं में अपनी छाप छोड़ी है। 27 अक्टूबर को उनके 72वें जन्मदिन पर उनके चाहने वाले उनके गीतों और भजनों को याद कर रहे हैं। उनका सफर फिल्मी गायन की शुरुआत से लेकर भक्ति संगीत में स्थापित पहचान तक की कहानी बयां करता है।

Pratahkal Newsroom

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