प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा हाल ही में दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए छात्रों के विरोध प्रदर्शन और उसके बाद के घटनाक्रम पर प्रसिद्ध अभिनेता अनुपम खेर ने खुलकर अपनी प्रतिक्रिया दी है। अभिनेता ने एक वीडियो संदेश साझा करते हुए जहां एक ओर छात्रों के आंदोलन और लोकतंत्र में संवाद की ताकत की सराहना की है, वहीं दूसरी ओर प्रदर्शन के दौरान देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ इस्तेमाल की गई अभद्र और अशोभनीय भाषा पर गहरी निराशा और दुख जताया है।

अनुपम खेर ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट्स पर साझा किए गए संदेश में कहा कि जब छात्र अपनी बात पूरी ईमानदारी और शांति के साथ रखते हैं, तो लोकतंत्र उनकी आवाज अवश्य सुनता है और समाधान भी निकलता है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि देश किसी एक आंदोलन पर नहीं रुक सकता, बल्कि इसे निरंतर भविष्य की ओर आगे बढ़ना होगा। हालांकि, उन्होंने इस पूरे घटनाक्रम के दौरान एक बेहद संवेदनशील और पीड़ादायक पहलू पर प्रकाश डालते हुए कहा कि सार्वजनिक मंचों और कैमरों के सामने जिस तरह से भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया गया, उसने उनके मन को अंदर से व्यथित कर दिया है।

अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए अभिनेता ने स्पष्ट किया कि लोकतंत्र में किसी भी नीति या निर्णय से असहमत होना और अपने निर्वाचित नेताओं से सवाल पूछना पूरी तरह से स्वाभाविक और नागरिकों का अधिकार है। उन्होंने कहा कि कोई भी नागरिक किसी भी नेता के विचारों से असहमत हो सकता है, लेकिन तर्क समाप्त होने के बाद जब गालियां और अमर्यादित भाषा का दौर शुरू होता है, तो वह स्वस्थ बहस नहीं बल्कि केवल शोर बनकर रह जाता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पिछले तीन दशकों से अधिक समय से सार्वजनिक जीवन में सक्रिय हैं और अपना पूरा जीवन देश की सेवा में समर्पित कर चुके हैं, ऐसे में किसी भी निर्वाचित प्रधानमंत्री की गरिमा का सम्मान करना हर नागरिक का नैतिक कर्तव्य है।

अनुपम खेर ने इस बात पर भी चिंता जताई कि यह संकीर्ण और गिरी हुई भाषा केवल युवाओं तक ही सीमित नहीं रही, बल्कि समाज के हर उम्र के लोग इस तरह के व्यवहार का हिस्सा बनते नजर आए। उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि जब हम सार्वजनिक जीवन में गरिमा की सीमाएं भूल जाते हैं, तो हम आने वाली पीढ़ियों को किस तरह के संस्कार सौंपेंगे। अक्सर देश को 'विश्व गुरु' बनाने की बात की जाती है, लेकिन कोई भी राष्ट्र केवल अर्थव्यवस्था, विज्ञान या तकनीक के दम पर विश्व गुरु नहीं बन सकता, इसके लिए समाज की ऊंची सोच और भाषा की उच्चता का होना भी उतना ही अनिवार्य है।

अपने संदेश के अंत में अभिनेता ने इस बात पर बल दिया कि देश के रूप में आगे बढ़ने के लिए नागरिकों को अपनी संस्कृति और मर्यादा को कभी नहीं भूलना चाहिए। सरकार से सवाल पूछना और नीतियों पर असहमति जताना लोकतंत्र की आत्मा है, लेकिन हमारी भाषा इतनी निम्न स्तर की नहीं होनी चाहिए कि वह हमारे विचारों से पहले हमारे चरित्र की पोल खोल दे। उन्होंने अंत में एक ऐसे भारत के निर्माण की वकालत की जहां विचारों के स्तर पर मतभेद तो हो सकते हैं, लेकिन आपसी सम्मान और दिलों के बीच दूरियां नहीं होनी चाहिए।

Lalita Rajput

Lalita Rajput

इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।

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