मुंबई। कान्स फिल्म फेस्टिवल के रेड कार्पेट पर आलिया भट्ट की उपस्थिति महज एक फैशन पल नहीं रही, बल्कि यह उनके स्टारडम, विशेषाधिकार और वैश्विक महत्वाकांक्षाओं के सार्वजनिक परीक्षण का केंद्र बन गई। ऑनलाइन माध्यमों पर आलिया के कान्स लुक का जिस प्रकार स्वागत हुआ, उसने एक नियमित वैश्विक रेड-कार्पेट इवेंट को पूर्ण सार्वजनिक ट्रायल में बदल दिया। उनके गाउन और चलने के अंदाज से लेकर उनकी वैश्विक लोकप्रियता और पुरुष-केंद्रित भारतीय सिनेमा पर दी गई टिप्पणियों तक, हर पहलू को बारीकी से परखा गया। यहाँ तक कि अंतरराष्ट्रीय फोटोग्राफरों द्वारा उन्हें दिए गए ध्यान की मात्रा भी राष्ट्रीय बहस का विषय बन गई। अंततः यह संवाद कान्स से हटकर आलिया भट्ट के साथ भारत के उस जटिल रिश्ते पर केंद्रित हो गया, जहाँ उन्हें एक साथ सराहा, तिरस्कृत और अत्यधिक जांच के दायरे में रखा जाता है।

ट्रॉलिंग की शुरुआत रेड कार्पेट की सामान्य समीक्षाओं से हुई, जिसमें उनके लुक की सार्थकता और उसकी यादगार क्षमता पर सवाल उठाए गए। हालांकि, आलिया के मामले में प्रतिक्रियाओं की ऊर्जा भिन्न थी। सोशल मीडिया का एक वर्ग इस दावे से उत्साहित दिखा कि अंतरराष्ट्रीय फोटोग्राफरों ने उन्हें कथित तौर पर नजरअंदाज किया। इस घटना के वीडियो क्लिप को केवल एक असहज पल के रूप में नहीं, बल्कि इस साक्ष्य के रूप में प्रसारित किया गया कि बॉलीवुड मशीनरी के बाहर आलिया की उतनी अहमियत नहीं है जितनी दिखाई जाती है। यह मात्र आलोचना नहीं, बल्कि कंटेंट की तलाश में छिपी हुई कड़वाहट थी।

विगत वर्षों में आलिया भट्ट बॉलीवुड में प्रिविलेज (विशेषाधिकार) का सबसे पॉलिश चेहरा बनकर उभरी हैं। वह सफल हैं, ब्रांड-फ्रेंडली हैं, वैश्विक स्तर पर दृश्यमान हैं और उन्हें फिल्म जगत के सबसे बड़े नामों व परिवारों का समर्थन प्राप्त है। वह अवसर और निरंतर दृश्यता का प्रतीक बन चुकी हैं, जिससे उपजा असंतोष कान्स के मंच पर मुखर होकर सामने आया। हालांकि बॉलीवुड में भाई-भतीजावाद और अवसरों की असमानता पर बहस वैध है, लेकिन जब किसी महिला कलाकार की हर उपलब्धि को केवल उसके सहयोगियों तक सीमित कर दिया जाता है, तो यह निष्पक्षता के बजाय सजा जैसा प्रतीत होने लगता है। ऐसे में यह प्रश्न उठता है कि क्या यह आलिया की आलोचना है या उनकी संभावित शर्मिंदगी का आनंद।

यही पैटर्न तब भी देखा गया जब उन्होंने भारतीय सिनेमा में पुरुष दर्शकों की प्रधानता और पुरुष-केंद्रित विमर्श—जैसे नायक की एंट्री, संवाद, हिंसा और बॉक्स ऑफिस पुल—पर टिप्पणी की। इस गंभीर विषय पर विमर्श करने के बजाय इंटरनेट ने तुरंत उन्हें 'पाखंडी' करार देकर मूल मुद्दे को दबा दिया। आलिया वर्तमान में एक ऐसे जाल में फंसी हैं जहाँ बोलने पर उन्हें अवसरवादी और चुप रहने पर गणनात्मक कहा जाता है। यदि उन्हें प्रशंसा मिलती है तो उसे पीआर (PR) बताया जाता है और मजाक उड़ने पर उसे स्वाभाविक प्रतिक्रिया का नाम दिया जाता है।

विडंबना यह है कि जो दर्शक बॉलीवुड की वैश्विक उपस्थिति की कमी की शिकायत करते हैं, वही किसी भारतीय सितारे के वैश्विक मंच पर दिखने पर उसका उपहास उड़ाते हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनुपस्थिति पर प्रतिनिधित्व का सवाल उठता है और उपस्थिति पर ध्यान आकर्षित करने की होड़ शुरू हो जाती है। कान्स ने आलिया को कठघरे में नहीं खड़ा किया, बल्कि इंटरनेट के सामूहिक व्यवहार ने उन्हें ट्रायल पर रखा। 'गंगूबाई काठियावाड़ी' में उनके चरित्र का विचार था—गरिमा के साथ जीना और डर के आगे न झुकना। वास्तविक प्रश्न यह नहीं है कि दुनिया ने उनके लिए कितनी जोर से तालियां बजाईं, बल्कि यह है कि हम अपने ही सितारों को वैश्विक स्तर पर छोटा होते देखने के लिए इतने उत्सुक क्यों थे।

Pratahkal Newsroom

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