कौन हैं अडूर गोपालकृष्णन? जिन्होंने मलयालम सिनेमा को दुनिया के नक्शे पर पहुंचाया
दादासाहेब फाल्के पुरस्कार विजेता निर्देशक अडूर गोपालकृष्णन ने अपनी 12 फिल्मों के जरिए भारतीय कला सिनेमा को वैश्विक स्तर पर एक नई पहचान और दिशा प्रदान की।

मलयालम सिनेमा के दिग्गज निर्देशक अडूर गोपालकृष्णन, जिन्होंने 'स्वयंवरम' और 'एलिप्पथायम' जैसी कालजयी फिल्मों के माध्यम से भारतीय समानांतर सिनेमा को अंतरराष्ट्रीय मंच पर स्थापित किया।
आज जब भारतीय सिनेमा की बात होती है तो बड़े बजट, मास एंटरटेनमेंट और पैन इंडिया फिल्मों का शोर सबसे ज्यादा सुनाई देता है, लेकिन इसी भीड़ में एक ऐसा नाम भी है जिसने बिना शोर मचाए भारतीय सिनेमा को इंटरनेशनल पहचान दिलाई। वो नाम है Adoor Gopalakrishnan। सोशल मीडिया पर एक बार फिर उनकी फिल्मों, सोच और सिनेमा में योगदान की चर्चा तेज है। वजह सिर्फ उनकी क्लासिक फिल्में नहीं, बल्कि वो विरासत है जिसने मलयालम सिनेमा में “न्यू वेव” की शुरुआत की और पूरी फिल्म इंडस्ट्री की दिशा बदल दी।
केरल के एक छोटे से गांव पल्लीकल में जन्मे अडूर गोपालकृष्णन ने शुरुआत में सरकारी नौकरी की थी। लेकिन सिनेमा का जुनून उन्हें पुणे के फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया तक ले गया। वहीं से उनकी असली फिल्मी यात्रा शुरू हुई। उन्होंने सिर्फ फिल्में नहीं बनाईं बल्कि केरल की पहली फिल्म सोसायटी “चित्रलेखा फिल्म सोसायटी” की नींव रखकर एक नए सिनेमा आंदोलन को जन्म दिया। उस दौर में जब कमर्शियल फिल्मों का बोलबाला था, अडूर ने समाज, इंसानी रिश्तों और केरल की संस्कृति को बेहद गहराई से पर्दे पर उतारा। उनकी पहली फीचर फिल्म “स्वयंवरम” ने 1972 में रिलीज होते ही इतिहास रच दिया और मलयालम सिनेमा में नई लहर ला दी।
अडूर गोपालकृष्णन की फिल्मों की खासियत उनका धीमा लेकिन बेहद असरदार नैरेटिव रहा है। “कोडियेट्टम”, “एलिप्पथायम”, “मुखामुखम”, “अनंतरम”, “मथिलुकल”, “विधेयन” और “कथापुरुषन” जैसी फिल्मों ने सिर्फ भारत में नहीं बल्कि कान्स, वेनिस, टोरंटो और बर्लिन जैसे इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल्स में भी तहलका मचाया। उनकी फिल्म “एलिप्पथायम” को ब्रिटिश फिल्म इंस्टीट्यूट अवॉर्ड मिला, जबकि लगातार छह फिल्मों के लिए उन्हें इंटरनेशनल फिल्म क्रिटिक्स प्राइज यानी एफआईपीआरईएससीआई सम्मान मिला। यही वजह है कि उन्हें सत्यजीत रे और मृणाल सेन जैसे दिग्गज निर्देशकों की कतार में रखा जाता है।
पांच दशक से ज्यादा लंबे करियर में अडूर ने सिर्फ 12 फीचर फिल्में बनाईं, लेकिन हर फिल्म अपने आप में एक मास्टरक्लास साबित हुई। उन्होंने 16 नेशनल फिल्म अवॉर्ड जीते, जो अपने आप में रिकॉर्ड जैसा माना जाता है। “स्वयंवरम” से लेकर “नालु पेनुंगल” तक उनकी फिल्मों ने बेस्ट फिल्म, बेस्ट डायरेक्टर और बेस्ट स्क्रीनप्ले जैसे कई बड़े सम्मान अपने नाम किए। भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री, पद्म विभूषण और भारतीय सिनेमा के सबसे बड़े सम्मान दादासाहेब फाल्के अवॉर्ड से नवाजा। फ्रांस सरकार ने भी उन्हें “लीजन ऑफ ऑनर” और “ऑर्डर ऑफ आर्ट्स एंड लेटर्स” जैसे प्रतिष्ठित सम्मान दिए।
अडूर सिर्फ निर्देशक नहीं बल्कि सिनेमा की एक पूरी विचारधारा माने जाते हैं। उनकी फिल्मों में ग्लैमर कम और जिंदगी की सच्चाई ज्यादा दिखाई देती है। यही वजह है कि उनकी फिल्में हर किसी के लिए आसान नहीं होतीं, लेकिन जो एक बार उनके सिनेमा को समझ लेता है, वो उसे कभी भूल नहीं पाता। हाल के सालों में कुछ विवादों और राजनीतिक बयानों को लेकर भी उनका नाम चर्चा में रहा, लेकिन इससे उनकी सिनेमाई विरासत पर कोई असर नहीं पड़ा। आज भी दुनियाभर के फिल्म स्कूलों में उनकी फिल्मों पर रिसर्च होती है और अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ विस्कॉन्सिन ने तो उनके नाम पर पूरा फिल्म आर्काइव और रिसर्च सेंटर तक बना दिया है।
दिलचस्प बात ये है कि अडूर गोपालकृष्णन ने हमेशा सिनेमा को सिर्फ मनोरंजन नहीं बल्कि समाज को आईना दिखाने का जरिया माना। शायद यही वजह है कि उनकी फिल्मों का असर वक्त के साथ और ज्यादा गहरा होता जा रहा है। आज की नई पीढ़ी जब कंटेंट सिनेमा की बात करती है, तो उसकी जड़ें कहीं ना कहीं अडूर जैसे फिल्मकारों से ही जुड़ी दिखाई देती हैं। वो सिर्फ मलयालम सिनेमा के निर्देशक नहीं, बल्कि भारतीय आर्ट सिनेमा की सबसे मजबूत पहचान बन चुके हैं।

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