भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ नाम ऐसे होते हैं जो केवल अभिनेता नहीं, बल्कि एक युग की पहचान बन जाते हैं। मोहनलाल ऐसा ही एक नाम हैं, जिन्होंने अपने अभिनय, व्यक्तित्व और बहुआयामी प्रतिभा से मलयालम सिनेमा को वैश्विक पहचान दिलाई। 21 मई 2026 को मोहनलाल अपना 66वां जन्मदिन मनाने जा रहे हैं। चार दशकों से अधिक लंबे करियर में उन्होंने 400 से ज्यादा फिल्मों में अभिनय कर भारतीय फिल्म उद्योग में एक ऐसी विरासत स्थापित की है, जिसे आने वाली पीढ़ियां भी याद रखेंगी।

21 मई 1960 को केरल के एलंथूर गांव में जन्मे मोहनलाल विश्वनाथन का बचपन तिरुवनंतपुरम के मुदावनमुगल इलाके में बीता। उनके पिता विश्वनाथन नायर केरल सरकार में लॉ सेक्रेटरी और वरिष्ठ नौकरशाह थे, जबकि उनकी मां शांताकुमारी परिवार की आधारशिला थीं। उनके बड़े भाई प्यारेलाल का वर्ष 2000 में हृदय संबंधी समस्याओं के कारण निधन हो गया था। निर्देशक बी. उन्नीकृष्णन उनके करीबी रिश्तेदार हैं। दिलचस्प बात यह है कि मोहनलाल का नाम उनके मामा गोपीनाथन नायर ने रखा था। शुरुआत में उनका नाम ‘रोशनलाल’ रखने की योजना थी, लेकिन बाद में ‘मोहनलाल’ नाम चुना गया। उनके पिता ने जानबूझकर उनके नाम के साथ जातिसूचक उपनाम ‘नायर’ नहीं जोड़ा।

स्कूल के दिनों से ही अभिनय की ओर झुकाव रखने वाले मोहनलाल ने छठी कक्षा में ‘कंप्यूटर बॉय’ नामक नाटक में 90 वर्षीय वृद्ध की भूमिका निभाकर पहली बार मंच पर कदम रखा। अभिनय के साथ-साथ खेलों में भी उनकी गहरी रुचि थी और 1977-78 के दौरान वे केरल राज्य के रेसलिंग चैंपियन भी बने।

मलयालम अभिनेता मोहनलाल

फिल्मी सफर की शुरुआत 1978 में फिल्म ‘थिरनोट्टम’ से हुई, जिसे उन्होंने अपने दोस्तों प्रियदर्शन, मणियनपिल्ला राजू, सुरेश कुमार और अन्य साथियों के साथ मिलकर बनाया था। हालांकि सेंसर संबंधी विवादों के कारण यह फिल्म 25 वर्षों तक रिलीज नहीं हो सकी। इसके बाद 1980 में निर्देशक फाजिल की फिल्म ‘मंजिल विरिंजा पुक्कल’ में खलनायक की भूमिका ने उन्हें पहचान दिलाई। उस समय किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि नकारात्मक किरदार निभाने वाला यह युवा कलाकार आगे चलकर भारतीय सिनेमा का सबसे सम्मानित चेहरा बन जाएगा।

1980 के दशक में मोहनलाल ने लगातार कई फिल्मों में नकारात्मक और चरित्र भूमिकाएं निभाईं। धीरे-धीरे ‘इविडे थुडंगुन्नु’, ‘पूचक्कोरु मूक्कुथी’, ‘बोइंग बोइंग’ और ‘अरम + अरम = किन्नारम’ जैसी फिल्मों ने उनकी छवि को एक बहुमुखी अभिनेता के रूप में स्थापित कर दिया। निर्देशक प्रियदर्शन के साथ उनकी जोड़ी ने मलयालम सिनेमा को कई यादगार फिल्में दीं।

1990 का दशक मोहनलाल के करियर का स्वर्णिम दौर साबित हुआ। ‘हिज हाइनेस अब्दुल्ला’, ‘मिधुनम’, ‘नंबर 20 मद्रास मेल’, ‘थाझवरम’ और ‘किलुक्कम’ जैसी फिल्मों ने उन्हें सुपरस्टार बना दिया। 1991 में रिलीज हुई ‘भरतम’ में एक कर्नाटक गायक की भूमिका निभाकर उन्होंने राष्ट्रीय पुरस्कार जीता। वहीं ‘देवासुरम’ जैसी फिल्में आज भी मलयालम सिनेमा की कल्ट क्लासिक मानी जाती हैं।

1997 में निर्देशक मणि रत्नम की तमिल फिल्म ‘इरुवर’ के जरिए उन्होंने गैर-मलयालम सिनेमा में कदम रखा। इस फिल्म में उन्होंने एक ऐसे अभिनेता का किरदार निभाया जो राजनीति में प्रवेश करता है। यह किरदार तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री M. G. Ramachandran से प्रेरित माना गया। फिल्म को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहना मिली और कई पुरस्कार भी हासिल हुए।

1999 में आई इंडो-फ्रेंच फिल्म ‘वनप्रस्थम’ ने मोहनलाल को वैश्विक पहचान दिलाई। कथकली कलाकार की त्रासदीपूर्ण जिंदगी पर आधारित इस फिल्म के लिए उन्हें दूसरा राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। फिल्म का प्रदर्शन कान फिल्म समारोह सहित कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर हुआ और उनकी अभिनय क्षमता की दुनियाभर में चर्चा हुई।

साल 2001 में भारत सरकार ने भारतीय सिनेमा में उनके योगदान के लिए उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया। इसके बाद 2019 में उन्हें पद्मभूषण मिला, जो देश का तीसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान है। 2009 में वे भारत के पहले अभिनेता बने जिन्हें टेरिटोरियल आर्मी में लेफ्टिनेंट कर्नल की मानद उपाधि दी गई। अमेरिकी समाचार चैनल CNN ने भी उन्हें उन कलाकारों में शामिल किया जिन्होंने भारतीय सिनेमा का चेहरा बदल दिया। वर्ष 2025 में भारत सरकार ने उन्हें भारतीय सिनेमा के सर्वोच्च सम्मान दादासाहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया। यह सम्मान उन्हें भारतीय सिनेमा के विकास और विस्तार में उनके असाधारण योगदान के लिए दिया गया।

फिल्मों के अलावा मोहनलाल रंगमंच से भी गहराई से जुड़े रहे। संस्कृत नाटक ‘कर्णभारम’ में कर्ण की भूमिका निभाकर उन्होंने थिएटर प्रेमियों को प्रभावित किया। ‘कथायट्टम’ और ‘छायामुखी’ जैसे नाटकों में उनके अभिनय को भी व्यापक सराहना मिली। अभिनय के साथ-साथ वे निर्माता, निर्देशक, प्लेबैक सिंगर और सांस्कृतिक प्रतिनिधि के रूप में भी सक्रिय रहे हैं।

उनकी निजी जिंदगी भी उतनी ही चर्चित रही है। 28 अप्रैल 1988 को उन्होंने तमिल फिल्म निर्माता के. बालाजी की बेटी सुचित्रा से विवाह किया। उनके दो बच्चे हैं प्रणव मोहनलाल और विस्मया मोहनलाल। प्रणव ने भी फिल्मों में अभिनय किया है। मोहनलाल को खाने-पीने का बेहद शौक है और वे खुद को ‘फूडी’ बताते हैं। आध्यात्म और संगीत में उनकी गहरी रुचि है तथा वे ओशो, जे. कृष्णमूर्ति, श्री अरविंद और रमण महर्षि जैसे विचारकों को पढ़ना पसंद करते हैं।

आज जब मोहनलाल अपने 66वें जन्मदिन की ओर बढ़ रहे हैं, तब वे केवल मलयालम सिनेमा के सुपरस्टार नहीं, बल्कि भारतीय फिल्म इतिहास की एक जीवित विरासत बन चुके हैं। उनकी फिल्मों, अभिनय शैली और सांस्कृतिक प्रभाव ने भारतीय सिनेमा को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया है। आने वाले वर्षों में भी उनका नाम भारतीय सिनेमा के सबसे प्रभावशाली और सम्मानित कलाकारों में गिना जाता रहेगा।

Manyaa Chaudhary

Manyaa Chaudhary

यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।

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