भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं, जो केवल कलाकार नहीं, बल्कि एक युग की पहचान बन जाते हैं। नूतन ऐसा ही एक नाम है एक ऐसी अदाकारा, जिसने अपने स्वाभाविक और गहन अभिनय से पर्दे पर स्त्री पात्रों को नई संवेदना और गरिमा दी। 21 फरवरी 1991 को उनका निधन हुआ, लेकिन उनकी कला आज भी हिंदी सिनेमा के स्वर्णिम अध्यायों में जीवित है।

चार दशकों तक फैले अपने करियर में नूतन ने 80 से अधिक फिल्मों में काम किया। शहरी प्रेम कहानियों से लेकर सामाजिक यथार्थ पर आधारित गंभीर फिल्मों तक, उन्होंने हर शैली में अपनी अलग पहचान बनाई। संघर्षशील, अंतर्द्वंद्व से जूझती और परंपरागत सीमाओं को तोड़ती महिला पात्रों को उन्होंने जिस सहजता से जीवंत किया, वह उस दौर में असाधारण माना गया। उन्हें सात फिल्मफेयर पुरस्कारों से सम्मानित किया गया, जिनमें सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के लिए रिकॉर्ड पाँच पुरस्कार शामिल थे। वर्ष 1974 में भारत सरकार ने उन्हें देश के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘पद्म श्री’ से अलंकृत किया।


शुरुआती सफर: कैमरे के सामने एक संकोची शुरुआत

नूतन ने पहली बार 1945 में अपने पिता की फिल्म नल दमयंती में बाल कलाकार के रूप में कैमरे का सामना किया। मात्र 14 वर्ष की आयु में उन्होंने 1950 में अपनी माँ के निर्देशन में बनी फिल्म हमारी बेटी से बतौर नायिका शुरुआत की। उस समय वह अपने रूप-रंग और अभिनय क्षमता को लेकर असमंजस में थीं, लेकिन फिल्म की रिलीज़ के बाद समीक्षकों ने उनके अभिनय में छिपी संभावनाओं को पहचाना। एक पत्रिका ने फिल्म की आलोचना की, परंतु नूतन के प्रदर्शन को “बेहद प्रभावशाली और भविष्य के लिए आशाजनक” बताया। उन्होंने फिल्म के संगीतकार स्नेहल भाटकर के साथ “तुझे कैसा दूल्हा भाए रे” गीत भी गाया, जो उनके बहुआयामी व्यक्तित्व का प्रमाण था। शुरुआती झिझक के बावजूद उन्होंने स्वयं को एक सशक्त अभिनेत्री के रूप में स्थापित किया।


1980 का दशक: चरित्र भूमिकाओं में नई पहचान

1980 के दशक में नूतन ने चरित्र भूमिकाओं की ओर रुख किया। माँ के किरदारों में उनकी सादगी और भावनात्मक गहराई दर्शकों के दिलों में उतर गई। साजन की सहेली (1981), मेरी जंग (1985) और नाम (1986) जैसी फिल्मों में उनके अभिनय को विशेष सराहना मिली। मेरी जंग में निभाई भूमिका के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री का फिल्मफेयर पुरस्कार मिला जो उनके करियर का छठा और अंतिम फिल्मफेयर सम्मान था। यह दौर दर्शाता है कि नूतन केवल नायिका के रूप में ही नहीं, बल्कि हर आयु और भूमिका में प्रभावशाली बनी रहीं।


11 अक्टूबर 1959 को नूतन ने भारतीय नौसेना के लेफ्टिनेंट-कमांडर रजनीश बहल से विवाह किया। उनके पुत्र मोहनीश बहल का जन्म 14 अगस्त 1961 को हुआ, जो आगे चलकर फिल्म और टेलीविजन जगत के स्थापित अभिनेता बने। परिवार की यह कलात्मक परंपरा उनकी पोती प्रनूतन बहल तक पहुँची, जिन्होंने भी अभिनय की राह चुनी। नूतन को शिकार का शौक था, जो उनके व्यक्तित्व के एक अलग आयाम को दर्शाता है। वर्ष 2004 में उनके पति की एक आग की दुर्घटना में मृत्यु हो गई।


बीमारी और अंतिम क्षण:

वर्ष 1990 में नूतन को स्तन कैंसर का पता चला। उपचार के दौरान भी उन्होंने अपने पेशेवर दायित्वों को निभाया और गरजना तथा इंसानियत की शूटिंग जारी रखी। फरवरी 1991 में तबीयत बिगड़ने पर उन्हें मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में भर्ती कराया गया। 21 फरवरी 1991 को दोपहर 12 बजकर 7 मिनट पर उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर ने फिल्म जगत और प्रशंसकों को गहरे शोक में डुबो दिया।

नूतन का जीवन केवल एक सफल अभिनेत्री की कहानी नहीं, बल्कि आत्मसंघर्ष, समर्पण और कला के प्रति अटूट निष्ठा का उदाहरण है। उनकी मृत्यु की बरसी हर वर्ष यह स्मरण कराती है कि सिनेमा केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि संवेदनाओं की अभिव्यक्ति भी है और उस अभिव्यक्ति को नूतन ने एक नई ऊँचाई दी।

Manyaa Chaudhary

Manyaa Chaudhary

यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।

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