राष्ट्रपति की कमाई पर बवाल; ट्रंप की तनख्वाह का खुलासा
भारत पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का टैरिफ प्रहार आज से प्रभावी हो गया है। अमेरिकी प्रशासन ने 25 प्रतिशत आयात शुल्क लगाने का फैसला लिया है, जो आने वाले 27 अगस्त से बढ़कर 50 प्रतिशत तक पहुंच सकता है। भारत-अमेरिका के बीच पांच चरणों की व्यापार वार्ता के बावजूद ट्रंप सरकार ने भारत के प्रस्तावों को खारिज कर दिया।
इस कड़े रुख से शेयर मार्केट में खलबली मच गई है और निवेशकों में चिंता की लहर दौड़ पड़ी है। लेकिन इस सबके बीच एक सवाल लोगों के मन में बार-बार उठ रहा है: आखिर ट्रंप, जो भारत पर इतना भारी आर्थिक दबाव बना रहे हैं, खुद व्हाइट हाउस से कितनी सैलरी लेते हैं? और वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से कितनी ज्यादा है?
डोनाल्ड ट्रंप की सैलरी: करोड़ों में कमाई
डोनाल्ड ट्रंप को अमेरिकी राष्ट्रपति के रूप में सालाना 4,00,000 डॉलर यानी लगभग ₹3.5 करोड़ रुपये (₹35,024,420) सैलरी मिलती है। यह राशि भारत के प्रधानमंत्री की तुलना में कई गुना ज्यादा है। और बात सिर्फ सैलरी तक सीमित नहीं है — ट्रंप को अपने पद के तहत मिलने वाले भत्ते और सुविधाएं भी किसी राजसी जीवन से कम नहीं हैं।
  • पर्सनल व ऑफिशियल खर्चों के लिए: $50,000 (₹43.78 लाख)
  • ट्रैवल भत्ता: $100,000 (कर-मुक्त)
  • इवेंट्स/भाषण होस्टिंग के लिए: $19,000
  • व्हाइट हाउस मेंटेनेंस फंड: $100,000
  • कुल मिलाकर, ट्रंप को सालाना $569,000 (लगभग ₹4.9 करोड़) तक की राशि विभिन्न मदों में मिलती है।
पीएम नरेंद्र मोदी की सैलरी: बेहद सादगीपूर्ण
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भारत सरकार से हर महीने लगभग ₹1.66 लाख सैलरी मिलती है। इसमें शामिल हैं:
  • ₹50,000 मूल वेतन
  • ₹45,000 संसदीय भत्ता
  • ₹3,000 व्यय भत्ता
  • ₹2,000 दैनिक भत्ता
सालाना गणना करें तो यह राशि लगभग ₹20 लाख होती है। सुविधाएं और सुरक्षा व्यवस्था उन्हें अलग से मिलती हैं, लेकिन ट्रंप की तुलना में यह सैलरी काफी कम है।
दोनों नेताओं की सैलरी में फर्क: 17 गुना से भी ज्यादा !
जब तुलना की जाती है, तो डोनाल्ड ट्रंप की सैलरी और सुविधाएं पीएम मोदी से 17 गुना ज्यादा हैं। यह फर्क न सिर्फ जिम्मेदारियों में अंतर को दर्शाता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि अमेरिका जैसे देश अपने राष्ट्राध्यक्षों को कितनी आर्थिक ताकत देता है।
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आर्थिक नीतियों में सख्ती, पर खुद को छूट ?
जहाँ एक ओर ट्रंप भारत जैसे विकासशील देश पर भारी टैरिफ का दबाव बना रहे हैं, वहीं दूसरी ओर खुद करोड़ों की सैलरी और भत्तों का आनंद ले रहे हैं। ऐसे में सवाल उठता है — क्या यह आर्थिक न्याय है या महज़ राजनीति?
Editorial

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