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मुंबई। महाराष्ट्र में पिछले छह महीनों के दौरान जैन समाज और राज्य सरकार के बीच तनाव तेजी से बढ़ा है। इसकी पृष्ठभूमि में कुछ ऐसे मुद्दे रहे हैं, जिनसे जैन समाज का गहरा भावनात्मक जुड़ाव रहा है। इन मुद्दों पर बीते छह महिनों में जो घटनाक्रम हुआ है, उसने जैन समाज को राज्य बीजेपी के प्रति एक शंका से भर दिया है। जाहिर है, बीजेपी ने अगर इस शंका का सही समय पर उचित तरीके से समाधान नहीं किया तो आनेवाले समय में चुनावी राजनीति के लिहाज से रिश्तों में आ रही खटास राज्य बीजेपी के दांत खट्टे कर सकती है।
पिछले छह माह में कुछ ज्वलंत मुद्दे इस नाराजगी के पीछे की वजह साबित हो रहे हैं। इनमें एक सदी पुराने जैन मंदिर का ध्वस्तीकरण, कबूतरखानों पर कार्रवाई, और एक मंदिर में रह रहे हाथी ‘महादेवी’ का जबरन स्थानांतरण जैसे मामले हैं। देश में जैनों की सबसे बड़ी आबादी वाले राज्य महाराष्ट्र में सड़कों पर विरोध प्रदर्शन भी नजर आए, जहां समुदाय ने सरकार पर उनके धार्मिक विश्वासों के प्रति असंवेदनशील होने का आरोप लगाया है।

वैसे आम तौर पर देखें तो जैन समाज और भाजपा का चोली-दामन का साथ नजर आता रहा है। भाजपा अपने इस सामाजिक जनाधार का महत्व समझती है। यही वजह है कि मौजूदा वक्त में एक के बाद एक उठे मुद्दों और उनके चलते जैन समाज में उभरती नाराजगी को राज्य बीजेपी के नेता भी समझ रहे हैं। नतीजा यह है कि बीजेपी ने अब डैमेज कंट्रोल की कवायद शुरु कर दी है। पार्टी इस बात पर पूरा जोर दे रही है कि सभी मामलों में जो भी कार्रवाई की गई है, वे राज्य सरकार की पहल पर नहीं हुई हैं। बल्कि ये सभी कार्रवाई न्यायालय के निर्देश और निर्णय के आधार पर ही हुई हैं। पार्टी नेता लगातार अपनी ओर से समाज के विभिन्न स्तरों पर लोगों से संवाद कर रहे हैं और अपनी सफाई पेश करते हुए आश्वस्त कर रहे हैं कि इसके पीछे किसी भी तरह की कोई भी धार्मिक दुर्भावना नहीं है।

क्यों है जैन समाज इतना महत्वपूर्ण ?
सिर्फ आबादी के लिहाज से देखें तो जैन समाज उतना असरदार नहीं नजर आता। साल 2011 की जनगणना के अनुसार, महाराष्ट्र में लगभग 14 लाख जैन हैं, जो देश के कुल जैनों का 32% हैं, हालांकि वे राज्य की कुल जनसंख्या का केवल 1.25% हैं। मुंबई (5.4%), मुंबई उपनगर (3.7%) और औरंगाबाद (0.8%) में इनकी सबसे अधिक उपस्थिति है। लेकिन खास बात यह है कि अपेक्षाकृत कम तादाद के बावजूद जैन समुदाय का आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव उल्लेखनीय है। वर्तमान महाराष्ट्र विधानसभा में समुदाय के 7 विधायक (2.43%) हैं, जिनमें से 6 भाजपा से हैं और एक भाजपा गठबंधन का हिस्सा है। यह गठबंधन पारंपरिक रूप से आर्थिक और चुनावी समर्थन पर आधारित रहा है। यह जगजाहिर है कि जैन समाज का एक बड़ा तबका बीजेपी का लंबे वक्त से पक्षधर रहा है। बीजेपी नेता बखूबी समझ रहे हैं कि इस समाज की भावनाओं की अनदेखी नहीं की जा सकती।

विवादों की शुरुआत कैसे हुई?

विवाद की शुरुआत अप्रैल में हुई जब बीएमसी ने मुंबई के विले पार्ले स्थित एक दिगंबर जैन मंदिर के कुछ हिस्सों को अवैध निर्माण बताते हुए ढहा दिया। यह कार्रवाई सिविल कोर्ट के उस आदेश के बाद की गई थी जिसमें मंदिर ट्रस्ट को अंतरिम संरक्षण बढ़ाने से इनकार किया गया था।

इस कार्रवाई के विरोध स्वरूप, 19 अप्रैल को हजारों जैन अनुयायियों ने बीएमसी के के-ईस्ट वॉर्ड कार्यालय तक मौन रैली निकाली और जवाबदेही की मांग की। इस कार्रवाई की महाराष्ट्र राज्य अल्पसंख्यक आयोग ने आलोचना करते हुए इसे ‘असमयिक’ बताया और समुदाय से उचित संवाद की मांग की।

कबूतरखानों पर रोक का फरमान
जुलाई में सरकार ने कबूतरखानों को बंद करने की घोषणा की, जो जैनों के लिए ‘जीव दया’ का प्रतीक माने जाते हैं। 3 जुलाई को विधान परिषद में मंत्री उदय सामंत ने मुंबई के 51 कबूतरखानों को सार्वजनिक स्वास्थ्य कारणों से बंद करने की घोषणा की। इसके बाद बीएमसी ने पूरे शहर में छापेमारी शुरू की, लोगों पर जुर्माना लगाया और कई कबूतरखानों को सील कर दिया गया। 31 जुलाई को बॉम्बे हाईकोर्ट ने कबूतरों को भोजन देने पर लगे प्रतिबंध के उल्लंघन पर एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिया। 2 अगस्त को दादर स्थित प्रसिद्ध कबूतरखाने सहित सभी स्थलों को तिरपाल से ढंक दिया गया, जिसे समुदाय ने प्रतीकात्मक अपमान माना। जाहिर है, सरकार की इस कार्रवाई ने असंतोष की आग में घी का काम किया है।

हाथी ‘महादेवी’ का मामला
कोल्हापुर के नंदनी गांव स्थित जैन मठ में 30 वर्षों से रह रही 36 वर्षीय हथिनी ‘माधुरी’ उर्फ ‘महादेवी’ को अदालत के आदेश से गुजरात के वंतारा एलिफेंट सेंक्चुरी में भेजा गया। यह आदेश एक उच्च-स्तरीय समिति की रिपोर्ट के आधार पर दिया गया था, जिसमें पीईटीए (पेटा) की शिकायत पर उसकी खराब सेहत का उल्लेख था। सुप्रीम कोर्ट ने 28 जुलाई को इस आदेश को बरकरार रखा। इसके बाद कोल्हापुर और नंदनी में हजारों लोगों ने विरोध प्रदर्शन कर हाथी को धार्मिक और भावनात्मक प्रतीक बताते हुए उसकी वापसी की मांग की।

भाजपा की प्रतिक्रिया
मंदिर तोड़फोड़ के बाद भाजपा नेताओं ने विरोध रैलियों और एकजुटता मार्च में भाग लिया। मंत्री मंगल प्रभात लोढ़ा, विधायक पराग अलवाणी और नगरसेवक मुरजी पटेल सहित कई नेता इन प्रदर्शनों में शामिल हुए। एमएसएमसी ने इस तोड़फोड़ को “आपराधिक” बताया। कबूतरखानों पर प्रतिबंध को लेकर लोढ़ा ने बीएमसी को पत्र लिखकर मानवीय और नियंत्रित समाधान की मांग की। हाथी महादेवी के मुद्दे पर डिप्टी सीएम देवेंद्र फडणवीस ने कहा कि राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दाखिल करेगी ताकि हाथी को वापस लाया जा सके।
हालांकि, मंदिर और कबूतरखाने के मामलों में सरकार के अधिकारियों ने न्यायिक आदेशों का हवाला दिया है और कहा है कि ये निर्णय अदालतों के निर्देश पर लिए गए हैं, न कि जैन समुदाय को लक्षित करने के उद्देश्य से। भाजपा जैन सेल के संयोजक संदीप भंडारी ने कहा, “इन कार्रवाइयों के पीछे भाजपा की कोई दुर्भावना नहीं है। सरकार समुदाय के साथ खड़ी है और समाधान निकालने की कोशिश कर रही है।”
जैन समाज के प्रतिष्ठित उद्यमियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के मुताबिक, यह सच है कि समुदाय में नाराजगी है। जैन समाज परंपरागत रूप से भाजपा के साथ रहा है, ऐसे में यह स्वाभाविक है कि लोग खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं।”
Editorial

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