Ungaludan Stalin Supreme Court Verdict : स्टालिन को बड़ी जीत, SC ने दी मंजूरी; याचिकाकर्ता को 10 लाख का झटका
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को तमिलनाडु सरकार की महत्वाकांक्षी योजना ‘उंगालुडन स्टालिन’ (Ungaludan Stalin) को हरी झंडी दे दी। कोर्ट ने इस योजना के खिलाफ मद्रास हाई कोर्ट में लंबित याचिका को खारिज करते हुए याचिकाकर्ता पर ₹10 लाख का हर्जाना लगाया। चीफ जस्टिस भूषण रामकृष्ण गवई की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा कि याचिकाकर्ता ने राजनीतिक लड़ाई के लिए न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग किया है।
क्या है ‘उंगालुडन स्टालिन’ कार्यक्रम ?
‘उंगालुडन स्टालिन’, जिसका अर्थ है ‘स्टालिन आपके साथ’, तमिलनाडु सरकार की एक विशेष पहल है। इस योजना का उद्देश्य राज्य में स्वास्थ्य सेवाओं को अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाना है। इसके तहत विभिन्न इलाकों में विशेष स्वास्थ्य कैंप लगाए जाते हैं ताकि आम जनता को सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं का लाभ मिल सके।
इस योजना पर AIADMK सांसद सी. वी. षणमुगम ने आपत्ति जताई थी। उन्होंने कहा था कि मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन के नाम पर सरकारी कार्यक्रम का नाम रखना नियमों के खिलाफ है। इसके आधार पर उन्होंने मद्रास हाई कोर्ट में याचिका दायर की, जिसके बाद हाई कोर्ट ने अस्थायी रूप से इस कार्यक्रम पर रोक लगा दी थी।
तमिलनाडु सरकार और DMK की सुप्रीम कोर्ट में जीत :
मद्रास हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ तमिलनाडु सरकार और सत्ताधारी पार्टी DMK सुप्रीम कोर्ट पहुंची। सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि यह कानून की गलत व्याख्या पर आधारित थी। बेंच ने स्पष्ट किया कि ‘कॉमन कॉज’ मामले में दिया गया फैसला सरकारी पैसों से राजनीतिक दलों के प्रचार पर रोक से संबंधित था, न कि सरकारी योजनाओं के नामकरण से।
बेंच ने कहा कि बाद में सुप्रीम कोर्ट ने ही सरकारी विज्ञापनों में मुख्यमंत्री की तस्वीर की अनुमति दी थी। इतना ही नहीं, अदालत ने कहा कि देश भर में नेताओं के नाम पर 45 से ज्यादा सरकारी योजनाएं चल रही हैं। इस तरह का नामकरण कोई असामान्य बात नहीं है।
याचिकाकर्ता पर सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख :
कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता षणमुगम ने पहले चुनाव आयोग को ज्ञापन दिया, लेकिन उसके आदेश का इंतजार नहीं किया। केवल 3 दिनों में हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। इसे कोर्ट ने न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग और राजनीतिक मकसद से प्रेरित माना। यही नहीं, याचिकाकर्ता ने चुनाव आयोग के खिलाफ विवादित बयान भी दिए।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस तरह की याचिकाएं न्यायिक संसाधनों की बर्बादी हैं और अदालतें इन्हें बर्दाश्त नहीं कर सकतीं। इसलिए याचिकाकर्ता पर ₹10 लाख का हर्जाना लगाया गया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि यह राशि एक सप्ताह के भीतर तमिलनाडु सरकार को जमा कराई जाए और इसे कल्याणकारी योजनाओं में उपयोग किया जाए।
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सुप्रीम कोर्ट का फैसला क्यों अहम है ?
यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह बताता है कि अदालतें राजनीतिक विवादों में हस्तक्षेप नहीं करेंगी, खासकर जब मामला केवल नामकरण या फोटो के इस्तेमाल का हो। साथ ही, यह भी संकेत देता है कि न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग करने वालों पर कड़ी कार्रवाई होगी।
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