सिर्फ शक था... और अल्ताफ को पीट-पीटकर अधमरा कर दिया



कासगंज (उत्तर प्रदेश): उत्तर प्रदेश के कासगंज से एक बेहद चिंताजनक और समाज को झकझोर देने वाला वीडियो सामने आया है, जिसमें बजरंग दल के कार्यकर्ता एक युवक को बेरहमी से पीटते नजर आ रहे हैं। वीडियो में पीटा जा रहा युवक अल्ताफ नाम का है, जो गोश्त लेकर जा रहा था। रास्ते में बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने उसे रोका, पकड़ा और फिर जानवरों की तरह पीटना शुरू कर दिया। दावा किया गया कि अल्ताफ गोमांस बेचने के इरादे से आया था, लेकिन यह महज़ एक शक था — जिसकी पुष्टि न तो मौके पर हुई और न ही कोई ठोस सबूत सामने आया।



■ सिर्फ शक बना हिंसा की वजह

इस घटना में सबसे चिंताजनक बात यह है कि बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने कोई वैध शिकायत दर्ज कराने या पुलिस को सूचना देने के बजाय, कानून को अपने हाथ में लेते हुए अल्ताफ पर जानलेवा हमला कर दिया। भीड़ में मौजूद लोग बारी-बारी से उस पर लात-घूंसे बरसाते रहे, जबकि अल्ताफ बार-बार कहता रहा कि उसने कुछ गलत नहीं किया है। उसे न तो अपनी सफाई देने का मौका मिला और न ही मानवीय व्यवहार।


■ पुलिस ने मांस को भेजा जांच के लिए

मौके पर पहुंची पुलिस ने अल्ताफ को स्थानीय अस्पताल में भर्ती कराया और उसके पास से बरामद किए गए मांस को फॉरेंसिक जांच के लिए लैब में भेजा है। यह जांच साबित करेगी कि वह मांस वास्तव में गोमांस था या नहीं। लेकिन असल सवाल यह है कि क्या कोई भी समूह सिर्फ शक के आधार पर किसी को मारने-पीटने का अधिकार रखता है?


■ एक महीने पहले भी अलीगढ़ में ऐसी ही घटना

गौरतलब है कि ठीक एक महीने पहले उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ से भी ऐसा ही एक दर्दनाक वीडियो सामने आया था, जिसमें कथित रूप से गोमांस ले जा रहे व्यापारियों को भी बजरंग दल जैसे संगठनों से जुड़े लोगों ने पीट-पीट कर अधमरा कर दिया था। उन घटनाओं में भी कानून के दायरे से बाहर जाकर हिंसा की गई थी, जबकि बाद में कई बार सामने आया कि बरामद किया गया मांस गोमांस नहीं था।

■ क्या ऐसे मामलों में कोई जवाबदेही होगी?

अब जबकि अल्ताफ के खिलाफ कोई स्पष्ट सबूत नहीं था और पुलिस जांच के बाद यदि यह साबित होता है कि वह मांस गोमांस नहीं था, तो क्या अल्ताफ को पीटने वाले लोगों को भी सख्त सजा मिलेगी?

क्या कानून सभी के लिए समान है?

क्या भीड़तंत्र का यह चलन लोकतंत्र को कमजोर नहीं कर रहा?

और अगर किसी की पहचान देखकर उस पर शक किया जा रहा है, तो क्या यह धर्म के आधार पर हिंसा नहीं है?


भारत एक लोकतांत्रिक देश है जहाँ कानून के तहत हर नागरिक को समान सुरक्षा और न्याय की गारंटी दी गई है। लेकिन अगर कानून को ताक पर रखकर भीड़ खुद को "न्याय का ठेकेदार" समझ बैठे, तो यह व्यवस्था के लिए खतरे की घंटी है। ऐसे मामलों में केवल पीड़ित को न्याय दिलाना ही नहीं, बल्कि दोषियों को सख्त सजा देकर एक स्पष्ट संदेश देना होगा — कि भीड़तंत्र और धार्मिक शक के आधार पर हिंसा अब बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

Editorial

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