✕
वो हत्या जिसने शिबू सोरेन की किस्मत बदल दी; बन गए ‘दिशोम गुरु’
By EditorialPublished on 4 Aug 2025 5:30 AM IST
झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के संस्थापक शिबू सोरेन का सोमवार (4 अगस्त) को निधन हो गया। उन्होंने लंबी बीमारी के बाद अंतिम सांस ली। शिबू सोरेन अपने पीछे एक मजबूत राजनीतिक विरासत छोड़ गए हैं। उनके बेटे हेमंत सोरेन फिलहाल झारखंड के मुख्यमंत्री हैं।
_202508041706448875.jpg)
x
_202508041706448875.jpg)
झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के संस्थापक शिबू सोरेन का सोमवार (4 अगस्त) को 81 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। उन्हें ‘दिशोम गुरु’ के नाम से जाना जाता था। उनके निधन के साथ ही झारखंड की राजनीति और आदिवासी आंदोलन के एक युग का अंत हो गया। वर्तमान में उनके बेटे हेमंत सोरेन झारखंड के मुख्यमंत्री हैं।
लेकिन शिबू सोरेन का यह सफर आसान नहीं था। उनका जीवन संघर्ष, आंदोलन और राजनीति की अनोखी गाथा है। आइए जानते हैं उस शख्स की कहानी, जिसने झारखंड राज्य के निर्माण में अहम भूमिका निभाई।
पिता की हत्या और आंदोलन की शुरुआत :
27 नवंबर 1957 को रामगढ़ जिले के नेमरा गांव में एक ऐसी घटना हुई जिसने शिबू सोरेन की जिंदगी बदल दी। उनके पिता सोबरन सोरेन की हत्या महाजनों ने कर दी, क्योंकि वे सूदखोरी और शराब के खिलाफ खड़े थे। तब शिबू सोरेन महज 13 साल के थे। इस घटना ने उनके मन में विद्रोह जगा दिया। उन्होंने धनकटनी आंदोलन शुरू किया, जिसका मकसद था आदिवासियों को उनका हक दिलाना।
इस आंदोलन के दौरान शिबू सोरेन ने महाजनों के खिलाफ आदिवासियों को जागरूक किया और उन्हें तीर-कमान उठाने के लिए प्रेरित किया। इसी दौर में लोग उन्हें ‘दिशोम गुरु’ यानी देश का गुरु कहने लगे।
झारखंड मुक्ति मोर्चा की स्थापना :
1972 में बिनोद बिहारी महतो, कॉमरेड एके राय और शिबू सोरेन ने मिलकर झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) की स्थापना की। इसका लक्ष्य था झारखंड को अलग राज्य का दर्जा दिलाना। 70 के दशक में यह आंदोलन इतना मजबूत हुआ कि केंद्र सरकार को झुकना पड़ा। जुलाई 2000 में संसद में बिल पेश हुआ और 2 अगस्त को पारित कर दिया गया। इसी के साथ झारखंड का सपना साकार हुआ।
राजनीतिक सफर: जीत-हार और विवादों से घिरा जीवन :
शिबू सोरेन ने पहली बार 1977 में दुमका से लोकसभा चुनाव लड़ा लेकिन हार गए। 1980 में जीतकर संसद पहुंचे और कई बार सांसद बने। वे केंद्र में कोयला मंत्री भी रहे। लेकिन उनका सफर विवादों से भी भरा रहा। चिरूडीह नरसंहार और शशिनाथ झा हत्याकांड जैसे मामलों ने उन्हें अदालतों के चक्कर कटवाए।
अभी प्रातःकाल Telegram चैनल को Subscribe करें और बनें ₹25,000 के लकी विनर!
2005 में वे पहली बार झारखंड के मुख्यमंत्री बने, लेकिन सिर्फ 9 दिन में इस्तीफा देना पड़ा। दूसरी बार 2008 में सीएम बने, मगर विधानसभा चुनाव हार गए। तीसरी बार 2009 में सीएम बने, लेकिन कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए।
दिशोम गुरु की विरासत :
राजनीति के उतार-चढ़ाव के बावजूद शिबू सोरेन का नाम हमेशा झारखंड आंदोलन के साथ जुड़ा रहेगा। उन्होंने जो सपना देखा था, उसे उनके बेटे हेमंत सोरेन ने पूरा किया और आज वे झारखंड के मुख्यमंत्री हैं। शिबू सोरेन के निधन ने न सिर्फ उनके परिवार में बल्कि पूरे झारखंड और आदिवासी राजनीति में एक गहरा शून्य छोड़ दिया है।

Editorial
Next Story
Related News
X
