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जूलर से जबरन वसूली के आरोप में निलंबित तीन जीआरपी पुलिसकर्मियों की अग्रिम जमानत याचिका खारिज
By EditorialPublished on
सेशन्स कोर्ट ने मंगलवार को जीआरपी के तीन आरोपी पुलिसकर्मियों की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी है।गवर्नमेंट रेलवे पुलिस (जीआरपी) के निलंबित तीन आरोपियों पर राजस्थान के एक जूलर को धमकाने, उसपर हमला करने और उससे जबरन वसूली करने का आरोप है।

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मुंबई। सेशन्स कोर्ट ने मंगलवार को जीआरपी (GRP) के तीन आरोपी पुलिसकर्मियों की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी है।गवर्नमेंट रेलवे पुलिस (जीआरपी) के निलंबित तीन आरोपियों पर राजस्थान के एक जूलर को धमकाने, उसपर हमला करने और उससे जबरन वसूली करने का आरोप है। अदालत ने माना कि सच्चाई जानने के लिए आरोपियों से हिरासत में पूछताछ और जांच जरूरी है। यही वजह है कि अदालत ने आरोपी राहुल भोसले, ललित जगताप और अनिल राठोड़ की गिरफ्तारी पूर्व अग्रिम जमानत की याचिका खारिज कर दी। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश प्रशांत काले ने कहा कि यदि आरोपियों को राहत दी गई तो वे इसे अपने लिए एक सुरक्षित कवच के तौर पर मानेंगे। अदालत के मुताबिक, इस तरह से हिरासत में लिए बिना ही पूछताछ करने का मतलब केवल औपचारिकता ही होगी। गौरतलब है कि एक जूलर ने जीआरपी के तीन पुलिसकर्मियों पर गंभीर रूप से धमकाने, हमला करने और जबरन वसूली करने का आरोप लगाया था। आरोप के मुताबिक, मुंबई सेंट्रल रेलवे स्टेशन पर तीनों आरोपी पुलिसकर्मियों ने 10 अगस्त को उसे बुरी तरह धमकाया, उस पर हमला किया और उससे करीब तीस हजार की रकम जबरन लूट ली। शिकायतकर्ता जूलर के मुताबि क, वह अपनी बेटी के साथ मुंबई से राजस्थान (Mumbai to Rajasthan) जाने के लिए मुंबई सेंट्रल स्टेशन पहुंचा था, तभी यह वारदात हुई। एक पुलिसकर्मी ने उससे जांच के नाम पर 31900 रूपये की नकदी और 14 ग्राम सोने का टुकड़ा जब्त कर लिया। जूलर और उसकी बेटी को एक कमरे में ले जाया गया और वहां उससे जबरन एक कागज पर दस्तखत ले लिए गए। पुलिसकर्मियों ने तीस हजार रूपये की नकदी अपने पास रख ली और 1900 रुपये और गोल्ड का टुकड़ा लौटा दिया। आरोपियों ने इस मामले में अपने बचाव में दावा किया है कि उन्हें फंसाया गया है। आरोपियों ने इसके पीछे एफआईआर दाखिल करने में पांच दिनों की देरी को अपनी दलील का आधार बनाया है। अभियोजन पक्ष की ओर से इस दलील का विरोध किया गया। अभियोजन पक्ष ने अदालत को बताया कि चूंकि शिकायतकर्ता राजस्थान अपने पैतृक गांव जा रहा था और इसी वजह से एफआईआर दर्ज करने में यह देरी हुई है। अभियोजन पक्ष के मुताबिक, पुलिस को अपनी कार्रवाई कानूनी प्रावधानों के अनुसार दर्ज करनी होती है लेकिन मौजूदा मामले में पुलिस ने कागजी कार्रवाई की औपचारिकताओं को नियमानुसार पूरा नहीं किया है। पुलिस को तलाशी और जांच की कार्रवाई सीसीटीवी निगरानी के तहत करनी चाहिए थी, लेकिन इसके बजाए शिकायतकर्ता को एक बंद कमरे में ले जाया गया जो काफी संदिग्ध स्थिति है। यह आरोपी पुलिसकर्मियों की बदनीयती को सीधे जाहिर करता है।

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