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मढ़ौरा से गिनी तक ‘कोमो’: बिहार का रेल इंजन कारखाना बना मेक इन इंडिया की पहचान
By EditorialPublished on
बिहार के सारण जिले के मढ़ौरा में स्थापित रेल इंजन कारखाना अब वैश्विक मानचित्र पर अपनी पहचान बना रहा है। यहां निर्मित शक्तिशाली रेल इंजन अफ्रीकी देश गिनी की पटरियों पर दौड़ने के लिए तैयार हैं। हाल ही में कारखाने से बनी पहली खेप के चार इंजन गिनी रवाना कर दिए गए। इन इंजनों का नाम ‘कोमो’ रखा गया है और यह निर्यात “मेक इन इंडिया” अभियान की बड़ी सफलता माना जा रहा है।

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पटना, 24 अगस्त।
बिहार के सारण जिले के मढ़ौरा में स्थापित रेल इंजन कारखाना अब वैश्विक मानचित्र पर अपनी पहचान बना रहा है। यहां निर्मित शक्तिशाली रेल इंजन अफ्रीकी देश गिनी की पटरियों पर दौड़ने के लिए तैयार हैं। हाल ही में कारखाने से बनी पहली खेप के चार इंजन गिनी रवाना कर दिए गए। इन इंजनों का नाम ‘कोमो’ रखा गया है और यह निर्यात “मेक इन इंडिया” अभियान की बड़ी सफलता माना जा रहा है।
140 इंजनों का निर्यात समझौता
इस वर्ष मई-जून में गिनी का प्रतिनिधिमंडल मढ़ौरा पहुंचा था। उसी दौरान 140 इंजनों के निर्यात का 3 हजार करोड़ रुपये का एकरारनामा हुआ। समझौते के महज दो महीने बाद ही पहली खेप रवाना हो जाना भारत की इंजीनियरिंग क्षमता और उत्पादन दक्षता को दर्शाता है। आने वाले महीनों में लगातार नई खेपें गिनी भेजी जाएंगी।
4500 हॉर्स पावर वाले आधुनिक इंजन
गिनी को निर्यात किए जाने वाले प्रत्येक लोको इंजन की क्षमता 4500 हार्स पॉवर है। सभी इंजन नीले रंग में बनाए गए हैं, जो गिनी के लिए विशेष रूप से डिजाइन किए गए हैं। इनका कैब पूरी तरह से एयरकंडीशंड है और इनमें इवेंट रिकॉर्डर, लोको कंट्रोल सिस्टम, एएआर ब्रेक सिस्टम समेत कई आधुनिक उपकरण लगाए गए हैं। भारत में जहां आमतौर पर रेल इंजन लाल और पीले रंग में बनाए जाते हैं, वहीं निर्यात के लिए नीले रंग का चुनाव किया गया है।
उत्पादन क्षमता और तकनीकी संरचना
मढ़ौरा रेल इंजन कारखाना करीब 200 एकड़ क्षेत्र में फैला है। यहां का निर्माण कार्य अक्टूबर 2015 से शुरू हुआ और 2018 से उत्पादन की शुरुआत हुई। कारखाने की चहारदीवारी 4.6 किमी लंबी है और इसे बनाने में 4500 मीट्रिक टन स्टील का उपयोग हुआ। परिसर के भीतर 4.8 किमी सड़क और 1.8 किमी रेल पटरी भी बनाई गई है।
इस प्लांट में लगभग 10 हजार मजदूर और 1528 स्थायी कर्मचारी काम करते हैं। इनमें 99 प्रतिशत बिहार के निवासी हैं। विशेष बात यह है कि बड़ी संख्या में महिलाएं भी यहां वेल्डिंग, क्रेन संचालन, असेंबली और टेस्टिंग जैसे तकनीकी कार्यों में योगदान दे रही हैं। कर्मचारियों की औसतन उम्र मात्र 24 वर्ष है और इनमें से अधिकांश बिहार के 17 तकनीकी संस्थानों से आए हैं।
हर दो दिन में तैयार होता है एक इंजन
फैक्ट्री में उत्पादन की रफ्तार बेहद तेज है। औसतन दो दिन में एक लोको इंजन तैयार कर लिया जाता है। अब तक यहां से करीब 700 इंजन का निर्माण हो चुका है। हर साल लगभग 100 इंजन बनाए जाते हैं। इसके साथ ही 2018 से अब तक यहां 250 से अधिक इंजनों का मेंटेनेंस भी किया जा चुका है। अकेले पिछले चार वर्षों में 500 इंजनों की मरम्मत की गई है।
निवेश और साझेदारी
यह कारखाना बिहार में निजी निवेश का बड़ा उदाहरण माना जा रहा है। इसमें रेल मंत्रालय की 24 प्रतिशत हिस्सेदारी है, जबकि 76 प्रतिशत हिस्सेदारी अंतरराष्ट्रीय कंपनी वेबटेक की है। प्लांट में अब तक करीब 800 करोड़ रुपये का निवेश हो चुका है, जो आने वाले वर्षों में बढ़कर 3 हजार करोड़ रुपये तक पहुंचने की उम्मीद है।
आर्थिक गतिविधियों को मिला सहारा
कारखाने की वजह से न केवल रोजगार के अवसर बढ़े हैं, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी गति मिली है। फैक्ट्री के संचालन से ही बिहार सरकार को प्रतिवर्ष 900 करोड़ रुपये जीएसटी प्राप्त हो रहा है। इतना ही हिस्सा केंद्र सरकार को भी जाता है। कंपनी सालाना 50 करोड़ रुपये से अधिक का बिजली बिल चुकाती है।
इसके अलावा आसपास के इलाकों में 3 होटल, 7 रेस्टोरेंट, 6 स्कूल, 3 बैंक और 6 एटीएम जैसी सुविधाओं का विकास हुआ है। स्थानीय लोगों को नए अवसर मिल रहे हैं और मढ़ौरा अब एक औद्योगिक हब के रूप में उभर रहा है।
बनारस बनाम मढ़ौरा: निर्यात में बढ़त
वाराणसी रेल इंजन कारखाना ने पिछले 50 वर्षों में केवल 15 से 20 इंजन का निर्यात किया है। जबकि, मढ़ौरा कारखाना मात्र कुछ ही वर्षों में गिनी को 140 इंजन निर्यात कर रहा है। यह उपलब्धि बिहार के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए गर्व का विषय है।
👉 मढ़ौरा से गिनी तक का यह सफर भारत की औद्योगिक क्षमता और “मेक इन इंडिया” की ताकत को दर्शाता है। अब बिहार का यह छोटा कस्बा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना रहा है और आने वाले समय में यहां से और भी शक्तिशाली इंजन विदेशों की पटरियों पर दौड़ेंगे।

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