भारत रूस तेल व्यापार : भारत रुस संबंधपर ट्रम्प का बडा बयान ; तेल निर्यात पर चौकानेवाला खुलासा
अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर भारत-रूस के ऊर्जा व्यापार पर सवाल उठाते हुए तीखी टिप्पणी की है। ट्रंप ने शुक्रवार को कहा कि उन्होंने "सुना है" कि भारत अब रूस से कच्चा तेल नहीं खरीदेगा। हालांकि उन्होंने यह भी जोड़ा कि वह इस जानकारी की पुष्टि नहीं कर सकते। ट्रंप ने इस कदम को "अच्छा निर्णय" बताते हुए कहा कि यह देखना दिलचस्प होगा कि आगे क्या होता है।
यह बयान ऐसे समय पर आया है जब अमेरिका रूस की अर्थव्यवस्था को यूक्रेन युद्ध के चलते सीमित करने के प्रयासों में जुटा हुआ है। अमेरिका चाहता है कि दुनिया के बड़े देश रूस से ऊर्जा और हथियारों की खरीद रोकें, ताकि उस पर आर्थिक दबाव बढ़ाया जा सके।
भारत की रूस से तेल खरीद की स्थिति :
भारत, जो दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक है, 2022 से रियायती रूसी कच्चे तेल का एक प्रमुख खरीदार रहा है। हालाँकि, हाल ही में सामने आई रिपोर्ट्स के अनुसार, भारतीय सरकारी रिफाइनरियों ने रूस से तेल खरीद को अस्थायी रूप से रोक दिया है। इसकी वजह घटती छूट और लॉजिस्टिक चुनौतियाँ बताई गई हैं। इसपर अभी भारत सरकार की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।
25% टैरिफ और संभावित जुर्माना :
डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में घोषणा की है कि अमेरिका भारत से आने वाले सभी निर्यातों पर 25% टैरिफ लगाएगा। उनका यह कदम भारत के रूस के साथ ऊर्जा व्यापार को लेकर है। साथ ही, उन्होंने कहा कि यदि भारत रूस से तेल और सैन्य उपकरणों की खरीद जारी रखता है, तो उस पर विशेष जुर्माना भी लगाया जाएगा।
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ट्रंप ने अपनी सोशल मीडिया पोस्ट में भारत की आलोचना करते हुए कहा था कि भारत एक तरफ रूस से सस्ता तेल और हथियार खरीदता है और दूसरी तरफ अमेरिकी उत्पादों पर भारी टैक्स लगाता है, जिससे व्यापार असमान हो जाता है।
भारत की प्रतिक्रिया :
ट्रंप के बयानों पर भारत सरकार की ओर से विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा, “भारत और रूस के संबंध समय-परीक्षित और स्थिर हैं। वहीं, भारत-अमेरिका संबंध साझा हितों, लोकतांत्रिक मूल्यों और मजबूत जन-जन संपर्क पर आधारित हैं।” भारत ने स्पष्ट किया कि वह अपने रणनीतिक हितों के अनुसार दोनों देशों के साथ संतुलन बनाए रखेगा।भारत की यह स्थिति साफ़ दर्शाती है कि वह किसी एक ध्रुव पर खड़े होने के बजाय बहुपक्षीय कूटनीति की ओर बढ़ रहा है।
Editorial

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