Prajwal Revanna Rape Case : रेप केस में कोर्ट का कड़ा रुख ; रेवन्ना की सियासत खत्म?
कर्नाटक की राजनीति एक बार फिर शर्मनाक कारणों से चर्चा में है। जनता दल (सेक्युलर) के निष्कासित नेता और पूर्व सांसद प्रज्वल रेवन्ना को बेंगलुरु स्थित जनप्रतिनिधियों की विशेष अदालत ने घरेलू कामगार से बलात्कार के मामले में दोषी करार दिया है। यह मामला हसन जिले के होलेनरसीपुरा स्थित एक फार्महाउस में घटित हुआ था, और एफआईआर दर्ज होने के महज 14 महीने के भीतर अदालत ने दोषसिद्धि सुना दी।
जैसे ही अदालत ने फैसला सुनाया, रेवन्ना कोर्टरूम में फूट-फूटकर रोने लगे। उनका यह भावनात्मक व्यवहार सोशल मीडिया और राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बन गया। कोर्ट अब 2 अगस्त 2025 को सजा की अवधि का ऐलान करेगी।
राजनीतिक परिवार से ताल्लुक :
प्रज्वल रेवन्ना कोई आम राजनेता नहीं हैं। वे पूर्व प्रधानमंत्री एच. डी. देवेगौड़ा के पोते और पूर्व मुख्यमंत्री एच. डी. कुमारस्वामी के भतीजे हैं। ऐसे में इस केस का असर केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे देवेगौड़ा परिवार की साख पर पड़ा है।
चार अलग-अलग FIR और गंभीर आरोप :
रेवन्ना के खिलाफ अप्रैल 2024 से जून 2024 के बीच चार अलग-अलग एफआईआर दर्ज की गईं, जिनमें यौन शोषण, बलात्कार, और डिजिटल अपराध से जुड़े गंभीर आरोप हैं। इनमें से दो साइबर क्राइम मामले भी शामिल हैं, जिनकी जांच CID की विशेष टीम ने की।
अश्लील वीडियो और फॉरेंसिक जांच :
इस केस में एक कथित अश्लील वीडियो भी सामने आया था, जिससे न्यायालय ने गंभीरता से तकनीकी जांच करवाई। सवाल यह था कि यह वीडियो रेवन्ना के मोबाइल से उनके ड्राइवर के फोन में कैसे ट्रांसफर हुआ। SIT की रिपोर्ट में डिजिटल लॉग्स, मेटाडेटा एनालिसिस और ट्रांसफर के माध्यम (जैसे WhatsApp या Bluetooth) की तकनीकी पुष्टि शामिल थी।
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परिवार पर भी कानूनी शिकंजा :
सिर्फ प्रज्वल ही नहीं, उनके पिता एच. डी. रेवन्ना, जो वर्तमान में होलेनरसीपुरा से विधायक हैं, उनके खिलाफ भी KR नगर पुलिस स्टेशन में एक मामला दर्ज है। आरोप है कि उन्होंने सबूतों के साथ छेड़छाड़ की या संभावित रूप से केस को प्रभावित करने की कोशिश की।
राजनीति और नैतिकता पर सवाल :
यह मामला केवल एक बलात्कार केस नहीं, बल्कि यह भारत में राजनीति, शक्ति और नैतिकता के टकराव की नजीर बन चुका है। अदालत का त्वरित फैसला न्यायपालिका की सक्रियता को दर्शाता है, लेकिन साथ ही यह भी सवाल खड़े करता है कि क्या राजनीतिक पहुंच और प्रभाव किसी को कानून से ऊपर कर सकते हैं?
Editorial

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