बिहार में अकेले उतरेंगे केजरीवाल; बिगाड़ेंगे चुनावी गणित
गुजरात उपचुनाव में जीत से उत्साहित आम आदमी पार्टी (AAP) के राष्ट्रीय संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने अब बिहार की ओर रुख कर लिया है। उन्होंने ऐलान कर दिया है कि बिहार विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी अकेले मैदान में उतरेगी। इस फैसले ने बिहार की सियासत में हलचल पैदा कर दी है और सवाल उठने लगे हैं कि क्या केजरीवाल का मकसद बिहार में अपनी सियासी जमीन बनाना है या फिर कांग्रेस का खेल बिगाड़ना?
तीसरे मोर्चे की सुगबुगाहट तेज :
बिहार में पहले से ही आरजेडी और कांग्रेस के गठबंधन के बीच सीटों को लेकर खींचतान होती रही है। ऐसे में केजरीवाल की अकेले चुनाव लड़ने की घोषणा से राज्य में तीसरे मोर्चे की संभावनाएं मजबूत होती दिख रही हैं। असदुद्दीन ओवैसी पहले ही बिहार में अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुके हैं, और अब केजरीवाल की आमद से मुकाबला और दिलचस्प हो गया है।
क्या कांग्रेस के लिए फिर खतरा बनेंगे केजरीवाल ?
राजनीतिक इतिहास उठाकर देखें तो केजरीवाल की सियासी चालों से सबसे ज्यादा नुकसान कांग्रेस को ही हुआ है। दिल्ली में कांग्रेस को सत्ता से बेदखल कर शीला दीक्षित का करियर खत्म किया, पंजाब में भी कांग्रेस की सत्ता छीनी और गुजरात में भी कांग्रेस की सीटें आप ने छीन लीं। गुजरात विधानसभा चुनाव 2022 में आम आदमी पार्टी ने जामजोधपुर और विसावदर जैसी परंपरागत कांग्रेस सीटों पर कब्जा कर लिया था।
बिहार में क्या है आप की तैयारी ?
बड़ा सवाल यह है कि क्या बिहार में आम आदमी पार्टी के पास कोई ऐसा नेता या कार्यकर्ता नेटवर्क है जो उन्हें राज्य की 243 विधानसभा सीटों पर मजबूती से चुनाव लड़वा सके? केजरीवाल के पास बिहार में संगठनात्मक ढांचा न के बराबर है। प्रशांत किशोर जैसे रणनीतिकार भी बिहार में अपना आधार बनाने के लिए वर्षों से संघर्ष कर रहे हैं और उन्हें भी अब तक पूरी सफलता नहीं मिली है।
क्या दोहराएंगे 2014 वाली गलती ?
2014 के लोकसभा चुनाव में केजरीवाल बिना मजबूत तैयारी के नरेंद्र मोदी के खिलाफ वाराणसी से चुनाव लड़े थे और हार का सामना करना पड़ा था। अब बिहार में भी बिना मजबूत संगठन और आधार के अकेले चुनाव लड़ने का फैसला कहीं वैसी ही रणनीतिक चूक तो नहीं होगी?
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केजरीवाल का असली लक्ष्य क्या है ?
विश्लेषकों का मानना है कि केजरीवाल बिहार चुनाव में कांग्रेस के वोट बैंक में सेंध लगाने का काम कर सकते हैं। INDIA गठबंधन के तहत बनी दोस्ती अब लोकसभा चुनाव तक ही सीमित लगती है। विधानसभा चुनावों में केजरीवाल अब अपनी अलग राह पकड़ते दिख रहे हैं।
असली तस्वीर चुनाव में होगी साफ ;
फिलहाल तो सवाल यही है कि बिहार में आम आदमी पार्टी अकेले चुनाव लड़ने के लिए 243 उम्मीदवार खोज पाएगी या नहीं। और अगर लड़ती है तो उसका असली मकसद क्या होगा कांग्रेस को कमजोर करना या बिहार में भविष्य के लिए अपनी सियासी जमीन तैयार करना। इन सवालों का जवाब आने वाले चुनावी नतीजे ही देंगे।
Editorial

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