उद्धव ने हाथ मिलाया तो पार्टी को हथिया लेंगे राज, ठाकरे बंधुओं की नजदीकियों पर नारायण राणे का तंज
महाराष्ट्र की राजनीति एक बार फिर गरमाई हुई है और इसकी वजह हैं शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) अध्यक्ष राज ठाकरे के बीच बढ़ती नजदीकियां। इन दोनों चचेरे भाइयों के बीच संभावित गठबंधन की अटकलों ने राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है। इसी बीच पूर्व केंद्रीय मंत्री और भाजपा नेता नारायण राणे का बड़ा बयान सामने आया है, जिसमें उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि अगर उद्धव और राज ठाकरे एक साथ आते हैं तो शिवसेना (यूबीटी) पर राज ठाकरे का कब्जा हो जाएगा और उद्धव पूरी तरह अप्रासंगिक हो जाए


मुंबई: महाराष्ट्र की राजनीति एक बार फिर गरमाई हुई है और इसकी वजह हैं शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) अध्यक्ष राज ठाकरे के बीच बढ़ती नजदीकियां। इन दोनों चचेरे भाइयों के बीच संभावित गठबंधन की अटकलों ने राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है। इसी बीच पूर्व केंद्रीय मंत्री और भाजपा नेता नारायण राणे का बड़ा बयान सामने आया है, जिसमें उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि अगर उद्धव और राज ठाकरे एक साथ आते हैं तो शिवसेना (यूबीटी) पर राज ठाकरे का कब्जा हो जाएगा और उद्धव पूरी तरह अप्रासंगिक हो जाएंगे।
राणे ने कहा – "राज को मिला समर्थन, उद्धव का खत्म होगा अस्तित्व"
विधानभवन परिसर में पत्रकारों से बातचीत करते हुए नारायण राणे ने कहा, "अगर राज ठाकरे उद्धव ठाकरे से हाथ मिला लेते हैं, तो शिवसेना (यूबीटी) की कमान खुद-ब-खुद राज के हाथों में चली जाएगी। राज की छवि आज भी एक तेजतर्रार नेता की है, जबकि उद्धव ने अपने पिता बालासाहेब ठाकरे की बनाई विरासत को बर्बाद कर दिया है।"
राणे का यह बयान ऐसे समय में आया है जब हाल ही में त्रिभाषा नीति के विरोध में उद्धव और राज ठाकरे एक साथ पांच जुलाई को 'विजय रैली' करने वाले हैं। इस कदम को मराठी अस्मिता के नाम पर एकजुटता का संकेत माना जा रहा था, लेकिन भाजपा खेमे में इसे लेकर असहजता देखी जा रही है।
"यह उनका पारिवारिक मामला है"
जब पत्रकारों ने राणे से पूछा कि क्या भाजपा इस संभावित गठबंधन को लेकर चिंतित है, तो उन्होंने कहा, "राज ठाकरे, उद्धव ठाकरे से हाथ मिलाना चाहते हैं या नहीं, यह पूरी तरह से उनका निजी और पारिवारिक मामला है। भाजपा इसमें किसी भी तरह का मार्गदर्शन नहीं कर सकती।"
राणे ने यह भी जोड़ा कि उद्धव की हालिया टिप्पणी कि भाजपा उद्धव और राज ठाकरे की नजदीकी से घबरा गई है, पूरी तरह निराधार है। उन्होंने तीखा हमला करते हुए कहा कि "बालासाहेब ठाकरे ने 48 सालों में जो राजनीतिक विरासत खड़ी की, उसे उद्धव ने ढाई साल में खत्म कर दिया।"
क्या वाकई करीब आ रहे हैं उद्धव और राज?
महाराष्ट्र की राजनीति में लंबे समय से उद्धव और राज ठाकरे के रिश्ते तल्ख रहे हैं। दोनों चचेरे भाई एक ही विचारधारा से निकलकर दो अलग-अलग राजनीतिक राहों पर चले गए। राज ठाकरे ने 2006 में शिवसेना छोड़कर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) बनाई थी। इसके बाद से दोनों के बीच राजनीतिक और पारिवारिक दूरी बनी रही।
लेकिन अब भाषा और क्षेत्रीय मुद्दों पर एकजुटता की कोशिशें दिख रही हैं। खासकर त्रिभाषा नीति के विरोध में दोनों नेताओं का एक मंच पर आना इस बात का संकेत माना जा रहा है कि एक नई राजनीतिक समीकरण की शुरुआत हो सकती है।
शिवसेना में असली नेतृत्व का सवाल
राणे ने एक बार फिर दोहराया कि "एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना ही असली शिवसेना है। उद्धव ठाकरे की पार्टी जनता और शिवसैनिकों का भरोसा खो चुकी है।"
उन्होंने यह भी कहा कि अगर उद्धव और राज ठाकरे वाकई हाथ मिलाते हैं, तो इसका सबसे बड़ा नुकसान उद्धव को होगा, क्योंकि राज की नेतृत्व क्षमता और लोगों के बीच लोकप्रियता उन्हें शिवसेना (यूबीटी) का स्वाभाविक उत्तराधिकारी बना देगी।
भले ही उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे सार्वजनिक मंच पर एक साथ आकर मराठी अस्मिता की लड़ाई लड़ने का दावा करें, लेकिन इसके राजनीतिक मायने कहीं ज्यादा गहरे हैं। भाजपा नेता नारायण राणे के बयान से स्पष्ट है कि पार्टी इस संभावित समीकरण को गंभीरता से ले रही है और इसमें राजनीतिक खतरा भी देख रही है।
अब देखना यह है कि 5 जुलाई की 'विजय रैली' के बाद उद्धव और राज ठाकरे के रिश्तों में वाकई कोई नया मोड़ आता है या यह सिर्फ एक मंचीय एकजुटता तक सीमित रहेगा। लेकिन फिलहाल इतना तय है कि महाराष्ट्र की सियासत में इस गठजोड़ की अटकलों ने एक बार फिर हलचल जरूर मचा दी है।

