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न तो अत्यधिक निकटता उचित है और न ही अत्यधिक दूरी
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जिसके जीवन में गुण ग्राहकता है, वह न केवल आगे बढ़ता है बल्कि सदा समृद्ध भी रहता है। यह विचार श्रमण संघीय युवाचार्य महेन्द्र ऋषि महाराज ने पनवेल में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि गुणों को देखने की दृष्टि अहोभाव से आती है, और जहाँ यह दृष्टि होती है, वहाँ आत्मविकास और संतुलन दोनों संभव होते हैं।

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मुंबई। जिसके जीवन में गुण ग्राहकता है, वह न केवल आगे बढ़ता है बल्कि सदा समृद्ध भी रहता है। यह विचार श्रमण संघीय युवाचार्य महेन्द्र ऋषि महाराज ने पनवेल में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि गुणों को देखने की दृष्टि अहोभाव से आती है, और जहाँ यह दृष्टि होती है, वहाँ आत्मविकास और संतुलन दोनों संभव होते हैं। उन्होंने कहा कि आज का मानव सांसारिक सुखों की दौड़ में फँस चुका है। जब वह जन्म लेता है, तो दो पाँव वाला होता है, पर जैसे-जैसे बड़ा होता है, अपने जीवन का पूरा बोझ चारपाई के पायों पर डाल देता है, अर्थात बंधनों में जकड़ जाता है।
उन्होंने समझाया कि जीवन में न तो अत्यधिक निकटता उचित है और न ही अत्यधिक दूरी। क्योंकि दोनों ही स्थितियाँ विकृति और उत्तेजना को जन्म देती हैं। मर्यादा का पालन ही आत्म-संयम और स्थिरता का आधार है।
संचालन अशोक बोहरा ने किया। लादूलाल ओस्तवाल, पुखराज मेहता, सुरेंद्रकुमार आंचलिया, प्रकाश बुरड़, सीमा गणोलिया, कंवरलाल सूरिया, सुरेश गुंदेचा, प्रकाश सिंघवी, पारस मोदी, महेन्द्र पगारिया, रुचीरा सुराणा, राजकुमारी बोहरा, प्रमिला सूरिया आदि की उपस्थिति रही।

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