ग्रेटर नोएडा, उत्तर प्रदेश |
शारदा यूनिवर्सिटी से शुक्रवार रात एक दर्दनाक खबर सामने आई, जिसने न केवल शिक्षा व्यवस्था बल्कि पूरे समाज को झकझोर कर रख दिया। यूनिवर्सिटी के गर्ल्स हॉस्टल में 21 वर्षीय बीडीएस (बैचलर ऑफ डेंटल सर्जरी) की छात्रा ज्योति शर्मा ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। इस घटना ने न केवल छात्र समुदाय को स्तब्ध कर दिया, बल्कि एक बार फिर से यह सवाल उठाया है कि शैक्षणिक संस्थानों में मानसिक उत्पीड़न कब रुकेगा?


सुसाइड नोट में दो फैकल्टी पर गंभीर आरोप

घटना के बाद मौके पर पहुंची पुलिस को छात्रा का एक सुसाइड नोट मिला, जो अंग्रेज़ी में लिखा गया था। इस नोट में ज्योति ने दो शिक्षकों – महेंद्र सर और शार्ग मैम (संभवत: शैरी वशिष्ठ) को अपनी मौत का ज़िम्मेदार ठहराया है।

ज्योति ने लिखा:

"मेरी मौत के ज़िम्मेदार महेंद्र सर और शार्ग मैम हैं! इन्होंने मुझे मानसिक रूप से प्रताड़ित किया है, अपमानित किया है।"


इस बयान ने यूनिवर्सिटी प्रशासन और पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं।


पुलिस ने दोनों आरोपियों को किया गिरफ्तार

घटना के बाद छात्र आंदोलन और बढ़ते दबाव को देखते हुए पुलिस ने दोनों फैकल्टी सदस्यों को गिरफ्तार कर लिया है। हालांकि, इस गिरफ्तारी के बावजूद छात्र संगठन और यूनिवर्सिटी के छात्र-छात्राएं इस मामले में सीबीआई जांच और यूनिवर्सिटी प्रशासन की जवाबदेही की मांग कर रहे हैं।


ओडिशा की घटना से मिलती-जुलती त्रासदी

अभी कुछ ही दिन पहले, ओडिशा के एक कॉलेज में भी 19 वर्षीय छात्रा ने यौन उत्पीड़न से परेशान होकर खुद को आग लगा ली थी, जिसकी बाद में मौत हो गई। छात्रा के परिवार ने आरोप लगाया था कि उसका प्रोफेसर लंबे समय से मानसिक और यौन उत्पीड़न कर रहा था।


भाजपा शासित राज्यों में खामोशी क्यों?

दोनों ही घटनाएं भाजपा शासित राज्यों – उत्तर प्रदेश और ओडिशा – की हैं। अफसोस की बात यह है कि इन गंभीर घटनाओं को राष्ट्रीय मीडिया में वो तवज्जो नहीं मिलती, जिसकी वे हकदार हैं। न तो टीवी डिबेट होते हैं, न ही कोई हाई-प्रोफाइल जांच की मांग उठती है।

इस मामले में सोशल मीडिया पर भी कई यूजर्स ने सवाल उठाए हैं कि क्या सत्ताधारी दलों से जुड़े राज्यों की घटनाओं को जानबूझकर दबा दिया जाता है?


कब मिलेगा इंसाफ?

यह पहली बार नहीं है जब छात्राएं शैक्षणिक संस्थानों में उत्पीड़न का शिकार हुई हैं। लेकिन हर बार की तरह इस बार भी मीडिया एक दिन चीखेगा और फिर चुप्पी छा जाएगी।

वास्तव में, यह सोचकर ही रूह कांप जाती है कि एक छात्रा को किस हद तक प्रताड़ित किया गया होगा, जो उसने आत्महत्या जैसा कदम उठाया। ये सिर्फ एक मौत नहीं, एक सिस्टम की विफलता है, जो न सुनता है, न समझता है।

अब ज़रूरत है…

  • शिक्षकों की सख्त जांच प्रक्रिया की

  • छात्राओं के लिए सुरक्षित और स्वतंत्र शिकायत तंत्र की

  • और सबसे अहम, हर मौत को केवल “घटना” मानने की सोच बदलने की।

ज्योति शर्मा अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनके पीछे जो सवाल और सन्नाटा छूट गया है, वो इस सिस्टम से जवाब मांगता है।

क्या उन सवालों को कोई सुनेगा? या फिर एक और फाइल, एक और मौत... बस खबर बनकर रह जाएगी?

Editorial

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