गुरुग्राम
— गुरुग्राम से एक दिल दहला देने वाली घटना सामने आई है, जहां एक पिता ने अपनी ही 25 वर्षीय बेटी कर दी। राधिका न सिर्फ एक उभरती हुई स्टेट लेवल टेनिस खिलाड़ी थी, बल्कि हाल ही में उसने बच्चों को ट्रेनिंग देने के लिए टेनिस क्लासेस भी शुरू की थीं। लेकिन उसके जीवन का यह उज्ज्वल सफर कुछ लोगों की सोच और पिता की मानसिक टूटन का शिकार बन गया।




खिलाड़ी बेटी, पिता का गर्व

राधिका यादव का टेनिस करियर बेहद प्रेरणादायक था। बचपन से ही खेलों में रुचि रखने वाली राधिका ने अपने प्रदर्शन से स्टेट लेवल पर पहचान बनाई। पिता दीपक यादव ने हमेशा उसका साथ दिया – चाहे बात दो लाख रुपये का रैकेट गिफ्ट करने की हो या उसे प्रोफेशनल ट्रेनिंग दिलाने की। बेटी की हर ज़रूरत को पिता ने प्राथमिकता दी।



बदलता वक्त और बढ़ता दबाव

हाल के महीनों में राधिका यादव ने टेनिस के साथ-साथ सोशल मीडिया पर रील्स बनाना शुरू किया। वह कई म्यूजिक वीडियो में भी दिखी, जिनमें कुछ लड़के उसके साथ नज़र आए। बस यहीं से समाज के एक हिस्से ने उसकी छवि पर सवाल उठाने शुरू कर दिए। “बेटी के पैसों पर जी रहा है...”, “कैसी लड़की है तेरी...” जैसे ताने सुनने को मिलने लगे।

दीपक यादव इन बातों से अंदर ही अंदर टूटते जा रहे थे। गिरफ्तारी के बाद जब पुलिस ने उनसे सवाल किए, तो उन्होंने कई बार जवाब बदले। पहले उन्होंने कहा कि उन्हें बेटी का टेनिस क्लास चलाना पसंद नहीं था। फिर ऑनर किलिंग जैसी मानसिकता की झलक सामने आई — रील्स, वीडियो और समाज की बातों ने उन्हें बेटी की हत्या करने के लिए उकसाया।



क्या रील बनाना इतना बड़ा अपराध था?

राधिका यादव एक स्वतंत्र और आत्मनिर्भर युवती थी। उसने अपने टैलेंट से न सिर्फ खुद का नाम रोशन किया, बल्कि दूसरों को भी प्रोत्साहित किया। सोशल मीडिया पर रील बनाना उसका व्यक्तिगत चुनाव था, जो कई युवाओं का ट्रेंड बन चुका है। लेकिन उसके पिता समाज के तानों से इतना टूट चुके थे कि उन्होंने इंसानियत की सारी हदें पार कर दीं।



बेटी तब 'ठीक' थी जब वो खिलाड़ी थी?

• पिता तब सही थे, जब उन्होंने राधिका को पूरी आज़ादी और खेल के लिए संसाधन दिए।

• बेटी तब सही थी, जब उसने नाच-गाने की दुनिया की जगह टेनिस जैसे कठिन खेल को चुना।

• लेकिन बेटी ‘गलत’ कब हुई? जब उसने खुद के मन की की, और समाज के बनाए नकली मापदंडों के खिलाफ जाकर खुद की पहचान बनाई?

राधिका यादव की कहानी सिर्फ एक ऑनर किलिंग नहीं, बल्कि एक लड़की की आज़ादी, समाज की सोच और एक पिता के अपने बेटी पर से टूटे विश्वास की त्रासदी है।

Editorial

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