संविधान की प्रस्तावना से 'सेकुलर' और 'समाजवाद' शब्द हटाने की मांग पर बढ़ा बवाल, विपक्ष ने RSS-BJP को घेरा आरएसएस के वरिष्ठ नेता दत्तात्रेय होसबोले द्वारा संविधान की प्रस्तावना से 'सेकुलर' और 'समाजवाद' शब्द हटाने की मांग पर सियासी घमासान तेज हो गया है। विपक्षी दलों ने इस बयान को लोकतंत्र पर हमला बताते हुए RSS और बीजेपी को कठघरे में खड़ा किया है। पूरे देश में यह मुद्दा अब राजनीतिक और वैचारिक बहस का केंद्र बन गया है।


RSS-बयान से मचा तूफान; उपराष्ट्रपति की तीखी प्रतिक्रिया
संविधान की प्रस्तावना में 'धर्मनिरपेक्ष' और 'समाजवादी' शब्दों को हटाने की बहस एक बार फिर गरमा गई है। इस बहस की शुरुआत आरएसएस के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले के बयान से हुई थी, लेकिन अब इसे और धार दी है देश के उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने। उपराष्ट्रपति ने संविधान की प्रस्तावना में आपातकाल के दौरान किए गए संशोधनों को 'नासूर' और 'सनातन की आत्मा का अपमान' करार दिया है।
उपराष्ट्रपति की तीखी टिप्पणी :
उपराष्ट्रपति भवन में आयोजित एक कार्यक्रम में जगदीप धनखड़ ने कहा कि 1976 में लगाए गए आपातकाल के दौरान संविधान की प्रस्तावना में जो शब्द जोड़े गए, वे भारत की लोकतांत्रिक आत्मा के साथ विश्वासघात थे। उन्होंने कहा, "प्रस्तावना किसी भी संविधान की आत्मा होती है। भारतीय संविधान की आत्मा को जबर्दस्ती बदला गया। 'धर्मनिरपेक्ष' और 'समाजवादी' जैसे शब्द आपातकाल के अंधकार में जबड़े गए। यह बदलाव सनातन की आत्मा का अपवित्र अनादर है।"
उन्होंने यह भी कहा कि उस समय देश की जनता मौलिक अधिकारों से वंचित थी और 'हम भारत के लोग' की संकल्पना के नाम पर एकतरफा बदलाव किया गया, जो आज भी संविधानिक मूल्यों को चुनौती देता है।
केसवनंद भारती केस का हवाला :
धनखड़ ने अपने संबोधन में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक केसवनंद भारती बनाम केरल राज्य (1973) केस का उल्लेख करते हुए कहा कि उस निर्णय में प्रस्तावना को संविधान की व्याख्या के लिए मार्गदर्शक के रूप में स्वीकार किया गया था। लेकिन जिस तरह से प्रस्तावना को 42वें संशोधन के तहत बदला गया, वह संविधान की स्थिरता और आत्मा के खिलाफ था।
डॉ. अंबेडकर और संविधान निर्माताओं का ज़िक्र :
उपराष्ट्रपति ने संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर का नाम लेते हुए कहा कि उन्होंने प्रस्तावना को सोच-समझकर मौलिक रूप में जोड़ा था। लेकिन आपातकाल के दौरान यह बदलाव करना उस सोच का अपमान है। उन्होंने कहा कि जिस समय जनता न्यायिक प्रक्रिया और मौलिक अधिकारों से वंचित थी, उस समय संविधान के सबसे पवित्र हिस्से को बदल दिया गया।
राजनीतिक बवाल और विपक्ष का हमला :
धनखड़ के इस बयान ने राजनीतिक हलकों में गर्मी ला दी है। विपक्षी दलों ने इसे सरकार की संविधान बदलने की मंशा का संकेत बताया है। कांग्रेस, वाम दल, टीएमसी और कई अन्य विपक्षी पार्टियों ने कहा कि संविधान से छेड़छाड़ की यह सोच खतरनाक है और इसे किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
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कांग्रेस प्रवक्ता ने कहा, "जब देश का उपराष्ट्रपति प्रस्तावना को नासूर बताए, तो यह साफ संकेत है कि संविधान पर खतरा मंडरा रहा है।" वहीं, वाम नेताओं ने इसे लोकतंत्र के मूल ढांचे पर हमला बताया।
देश में फिर गरमाई प्रस्तावना की बहस :
पिछले कुछ वर्षों से 'समाजवाद' और 'धर्मनिरपेक्षता' जैसे शब्दों को संविधान से हटाने की चर्चा समय-समय पर उठती रही है। लेकिन अब जब इस पर संवैधानिक पदों पर बैठे लोग खुलकर बोलने लगे हैं, तो यह बहस सिर्फ वैचारिक नहीं, बल्कि राजनीतिक रणभूमि बनती जा रही है। इस बयान के बाद अब निगाहें संसद के आगामी सत्र और राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया पर टिकी हैं। क्या यह सिर्फ एक विचारधारा की अभिव्यक्ति है या किसी बड़ी संवैधानिक पहल की प्रस्तावना — इसका जवाब आने वाले दिनों में और स्पष्ट होगा।
Editorial

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