आशूरा पर सऊदी में सन्नाटा, सुरक्षा घेरे में हुए मजलिस और मातम
इस्लामिक कैलेंडर का पहला महीना मोहर्रम मुसलमानों के लिए बेहद खास और भावनात्मक होता है। यह महीना रमजान के बाद इस्लामी परंपरा में सबसे पवित्र माना जाता है। खासकर शिया समुदाय के लिए यह महीना गम और शोक का प्रतीक है। मोहर्रम की दसवीं तारीख को 'आशूरा' कहा जाता है, जो इमाम हुसैन की शहादत की याद में मनाया जाता है। साल 2025 में मोहर्रम 27 जून से शुरू होने की संभावना है और आशूरा 6 जुलाई को मनाया जाएगा।
क्यों मनाया जाता है मोहर्रम ?
मोहर्रम के दौरान मुसलमान विशेष रूप से इमाम हुसैन और उनके अनुयायियों की कर्बला में हुई शहादत को याद करते हैं। कर्बला की यह ऐतिहासिक घटना 680 ईस्वी में घटित हुई थी, जब पैगंबर मोहम्मद के नवासे इमाम हुसैन ने अन्याय और ज़ुल्म के खिलाफ खड़े होकर अपनी जान की कुर्बानी दी थी। इस बलिदान को याद करते हुए शिया समुदाय ताजिया, मातम, मजलिस और जुलूसों के ज़रिए शोक प्रकट करता है।

भारत में मोहर्रम की परंपरा :
भारत में मोहर्रम का माहौल बेहद भावनात्मक और सार्वजनिक होता है। यहाँ शिया समुदाय द्वारा बड़े पैमाने पर ताजिया निकाला जाता है, मजलिसें होती हैं, और मातम मनाया जाता है। लोग काले कपड़े पहनते हैं, छाती पीटते हैं और इमाम हुसैन के बलिदान को याद करते हैं। कई लोग रोज़ा भी रखते हैं और समाज में पानी पिलाने की व्यवस्था (सबील) लगाते हैं।
सऊदी अरब में मोहर्रम का स्वरूप :
इसके विपरीत, सऊदी अरब में मोहर्रम का स्वरूप काफी अलग और सीमित होता है। यहाँ शोक कार्यक्रमों को सार्वजनिक रूप से मनाने की अनुमति नहीं होती। देश में वहाबी इस्लाम के प्रभाव के कारण, शिया परंपराओं को सीमित या नियंत्रित किया जाता है। सऊदी कानून के अनुसार सार्वजनिक जुलूस, ताजिया या मातम करना गैरकानूनी माना जाता है।
हालाँकि, सऊदी के शिया बहुल क्षेत्रों जैसे क़तीफ़ और अल-अहसा में कुछ लोग निजी तौर पर आशूरा और मोहर्रम मनाते हैं। वहां पर मजलिसें अक्सर घरों या बंद स्थानों पर होती हैं, जहाँ लोगों को आमंत्रण देकर बुलाया जाता है। इसके अलावा, पानी की सबील भी लगाई जाती है, लेकिन इसमें अधिकतर प्रवासी – भारतीय, पाकिस्तानी या बांग्लादेशी – मुस्लिम समुदाय शामिल होता है।
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सऊदी में कानून और धार्मिक स्वतंत्रता :
सऊदी अरब में धार्मिक प्रदर्शन पर सख्त नियंत्रण है। शिया समुदाय को सार्वजनिक स्तर पर अपनी परंपराएं निभाने की पूरी आज़ादी नहीं है। सरकार की नजरें ऐसे आयोजनों पर कड़ी होती हैं और कानून का उल्लंघन करने पर दंडात्मक कार्रवाई हो सकती है। इस वजह से, वहां शोक की रस्में अक्सर छिपकर या बेहद सीमित तरीके से मनाई जाती हैं।
जहाँ भारत में मोहर्रम एक सामाजिक और सांस्कृतिक रूप ले चुका है, वहीं सऊदी अरब में यह एक संवेदनशील धार्मिक विषय बना हुआ है। हालांकि दोनों ही स्थानों पर इमाम हुसैन की शहादत का सम्मान किया जाता है, लेकिन उसे व्यक्त करने के तरीके, कानून और सामाजिक स्वीकृति में बड़ा अंतर है। 2025 में एक बार फिर मोहर्रम का महीना यह दिखाएगा कि कैसे एक ही धार्मिक परंपरा, अलग-अलग देशों में भिन्न रूप में जीवित रहती है।
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