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अखिलेश की गड़बड़ियों पर CBI का पर्दा; जांच रोकने के संकेत
By EditorialPublished on
उत्तर प्रदेश में सरकार बदलने के बाद शुरू हुई यूपीपीएससी घोटाले की जांच अब मोड़ पर आ गई है। योगी सरकार ने 2017 में अखिलेश यादव के कार्यकाल के दौरान हुए यूपी लोक सेवा आयोग (UPPSC) के चयन प्रक्रियाओं की जांच के लिए सीबीआई को जिम्मेदारी सौंपी थी। कई वर्षों से चल रही इस जांच को अब खुद सीबीआई ने बंद करने की चेतावनी दी है। एजेंसी ने यूपीपीएससी को साफ शब्दों में कहा है कि अगर सहयोग नहीं मिला, तो वह इस केस को आगे नहीं बढ़ाएगी। सीबीआई का यह रुख कई सवाल खड़े करता है—क्या जांच राजनीतिक दबाव में है, या फिर सबूतों की कमी

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उत्तर प्रदेश की सबसे प्रतिष्ठित सरकारी भर्तियों में से एक—पीसीएस-2015 और एपीएस-2010 भर्ती—अब दोराहे पर खड़ी है। इन भर्तियों में गड़बड़ी और भ्रष्टाचार की जांच कर रही केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग (UPPSC) पर गंभीर आरोप लगाते हुए जांच बंद करने की चेतावनी जारी की है।
सीबीआई निदेशक प्रवीण सूद ने इस संबंध में उत्तर प्रदेश सरकार को एक औपचारिक पत्र भेजा है, जिसमें उन्होंने साफ किया है कि अगर आयोग 30 दिनों के भीतर जरूरी दस्तावेज और जांच में सहयोग नहीं देता, तो एजेंसी को विवश होकर यह जांच समयपूर्व बंद करनी पड़ेगी।
CBI की नाराज़गी: चार साल से आंशिक सहयोग :
CBI ने बताया कि पिछले चार वर्षों में उसने आयोग को बार-बार पत्र लिखे, जांच से जुड़े दस्तावेज मांगे और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17-ए के अंतर्गत अधिकारियों के खिलाफ जांच की अनुमति चाही, लेकिन आयोग की ओर से अब तक या तो कोई स्पष्ट जवाब नहीं आया या अधूरी जानकारी भेजी गई।
CBI प्रमुख ने राज्य सरकार से वरिष्ठ अधिकारियों के स्तर पर हस्तक्षेप की मांग की है ताकि लंबित मामले आगे बढ़ सकें। एजेंसी ने यह भी चेताया कि जांच में हो रही देरी से इलाहाबाद हाईकोर्ट में लंबित मामलों की सुनवाई प्रभावित हो रही है और CBI की साख पर भी सवाल उठने लगे हैं।
कैसे और कब शुरू हुई थी जांच ?
यह मामला 2017 में उस समय सामने आया, जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार ने पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के कार्यकाल (2012–2017) के दौरान हुई UPPSC भर्तियों की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए जांच की सिफारिश की। इसके बाद 5 मई 2018 को PCS-2015 भर्ती और 4 अगस्त 2021 को APS-2010 भर्ती मामले में CBI ने एफआईआर दर्ज की। जांच में तत्कालीन आयोग अधिकारियों—सिस्टम एनालिस्ट गिरीश गोयल, अनुभाग अधिकारी विनोद कुमार सिंह, और समीक्षा अधिकारी लाल बहादुर पटेल समेत कई नाम सामने आए।
UPPSC की सफाई :
CBI के आरोपों पर प्रतिक्रिया देते हुए UPPSC सचिव अशोक कुमार ने कहा कि दस्तावेजों की संख्या अत्यधिक है, और उनकी नंबरिंग व प्रतिलिपि तैयार करने में समय लग रहा है। उन्होंने दावा किया कि आयोग ने नियत समय पर अधिकांश अभिलेख CBI को सौंप दिए हैं, और शेष कागजात भी जल्द भेजे जाएंगे। साथ ही, सचिव ने बताया कि लोक सेवकों के खिलाफ जांच की अनुमति को लेकर राज्य स्तर पर विचार-विमर्श जारी है, इसलिए प्रक्रिया में कुछ देरी हो रही है।
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राजनीतिक पृष्ठभूमि और संभावित असर :
चूंकि यह मामला सीधे तौर पर अखिलेश यादव सरकार के कार्यकाल से जुड़ा है, इसलिए राजनीतिक हलकों में भी इसकी चर्चा गर्म है। अगर CBI यह जांच बंद करती है, तो इससे न सिर्फ योगी सरकार की साख पर असर पड़ेगा, बल्कि भविष्य में ऐसी संस्थागत जांचों की निष्पक्षता और गंभीरता पर भी सवाल उठ सकते हैं।

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