ईरान-इज़रायल से लेकर भारत तक; अमेरिका की छुपी जंगों का कच्चा चिट्ठा!
मध्य पूर्व में छिड़ी ईरान और इज़राइल की जंग अब अंतरराष्ट्रीय संकट का रूप लेती जा रही है। दोनों देशों के बीच बीते छह दिनों से जारी सैन्य संघर्ष के बीच अब अमेरिका भी इसमें खुलकर उतरने की तैयारी में है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के खिलाफ सख्त कदम उठाने की बात कही है और इज़राइल को पूरी तरह समर्थन देने का संकेत भी दिया है।
व्हाइट हाउस में चला युद्ध मंथन :
अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, राष्ट्रपति ट्रंप ने हाल ही में व्हाइट हाउस के सिचुएशन रूम में एक उच्चस्तरीय बैठक की जिसमें उनकी नेशनल सिक्योरिटी टीम शामिल थी। लगभग 20 मिनट चली इस मीटिंग में ईरान के परमाणु ठिकानों पर सैन्य कार्रवाई के विकल्पों पर चर्चा की गई। इस मीटिंग के बाद स्पष्ट है कि अमेरिका अब सिर्फ बयानबाज़ी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि युद्ध में सक्रिय भूमिका निभा सकता है।
अमेरिका की पुरानी आदत – दुनिया की जंगों में दखल :
हालांकि, यह कोई पहली बार नहीं है जब अमेरिका दो देशों के बीच चल रहे युद्ध में हस्तक्षेप करने जा रहा है। इससे पहले भी अमेरिका कई अंतरराष्ट्रीय संघर्षों में 'ग्लोबल सुपरपावर' के तौर पर एंट्री ले चुका है।
कोरियाई युद्ध (1950-1953): पहला बड़ा हस्तक्षेप :
25 जून 1950 को उत्तर कोरिया ने दक्षिण कोरिया पर हमला कर युद्ध की शुरुआत की। उत्तर कोरिया को सोवियत संघ का समर्थन प्राप्त था, जबकि दक्षिण कोरिया को अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र का। अमेरिका ने दक्षिण कोरिया की मदद के लिए अपनी सेना भेजी, जिससे यह युद्ध तीन साल तक चला। 1953 में युद्ध विराम हुआ, लेकिन दोनों कोरिया आज भी तकनीकी रूप से युद्ध की स्थिति में हैं।
चीन के साथ अप्रत्यक्ष टकराव :
कोरियाई युद्ध के दौरान ही अमेरिका का चीन के साथ टकराव भी सामने आया। चीन ने उत्तर कोरिया का समर्थन किया, और अमेरिकी सेनाओं से उसकी सीधी मुठभेड़ हुई। हालांकि, यह युद्ध कभी भी चीन और अमेरिका के बीच औपचारिक युद्ध का रूप नहीं ले सका, लेकिन यह तनाव आज भी यूएस-चीन रिश्तों में झलकता है।
भारत के खिलाफ भी अमेरिका ने दिखाया था सैन्य तेवर :
कम ही लोगों को पता है कि 1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान अमेरिका ने भारत के खिलाफ भी सीधा सैन्य दबाव बनाने की कोशिश की थी। उस वक्त अमेरिका के राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन और विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर पाकिस्तान के समर्थन में थे। जब भारत ने पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) की स्वतंत्रता में मदद शुरू की, तो अमेरिका ने अपना नौसैनिक बेड़ा 'यूएसएस एंटरप्राइज' बंगाल की खाड़ी में भेज दिया।
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हालांकि यह कदम अमेरिकी नागरिकों को निकालने के बहाने उठाया गया था, लेकिन असल में यह भारत को डराने और दबाव में लाने की रणनीति थी। जमीन पर अमेरिका ने अपनी सेना नहीं उतारी, लेकिन उसकी मौजूदगी ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हलचल मचा दी थी।
अब क्या ईरान के खिलाफ होगा बड़ा हमला ?
अब जब ईरान और इज़राइल के बीच टकराव बढ़ रहा है और अमेरिका खुलकर मैदान में उतरने की तैयारी कर रहा है, तो एक बड़ा सवाल यह है कि क्या अमेरिका फिर किसी विदेशी युद्ध में सैन्य हस्तक्षेप करेगा? क्या ईरान के परमाणु ठिकाने अमेरिका की अगली निशाना बनेंगे? आने वाले दिन इस दिशा में नए मोड़ ला सकते हैं।
Editorial

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