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जंग के साथ चल रही ‘कार्बन वॉर’, इजरायल से उठ रहा ज़हरीला धुआं
By EditorialPublished on
पिछले कुछ वर्षों में दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में युद्ध की आग भड़कती रही है—चाहे वह रूस-यूक्रेन का संघर्ष हो, इजरायल-गाजा की लड़ाई या फिर अब ईरान और इजरायल के बीच छिड़ी जंग। इन सैन्य टकरावों ने जहां हजारों जिंदगियों को प्रभावित किया है, वहीं प्राकृतिक पर्यावरण पर भी इसका विनाशकारी असर पड़ा है। बारूद, बमबारी और सैन्य गतिविधियों से न केवल ज़मीन बंजर हो रही है, बल्कि हवा में जहरीले कार्बन तत्व घुलकर ग्लोबल वॉर्मिंग और जलवायु संकट को और गहरा कर रहे हैं। युद्ध अब केवल सीमाओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह पूरे ग्र

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"जंग तो खुद ही एक मसला है, जंग क्या मसलों का हल देगी..." — ये पंक्तियाँ आज के हालात पर बिल्कुल सटीक बैठती हैं। बीते कुछ सालों में दुनिया के कई हिस्सों में युद्ध और संघर्ष की आग धधक रही है। रूस-यूक्रेन, इजरायल-गाजा और अब ईरान-इजरायल के बीच चल रही जंगों ने न सिर्फ मानवता को हिला कर रख दिया है, बल्कि धरती और पर्यावरण पर भी गहरा और दीर्घकालिक असर डाला है। यह सिर्फ गोलियों और बमों की नहीं, बल्कि प्रकृति के खिलाफ छेड़ी गई एक अदृश्य लड़ाई भी है, जिसका खामियाजा पूरे विश्व को भुगतना पड़ रहा है।
जंग सिर्फ हथियारों से नहीं, पर्यावरण से भी लड़ रही है :
इन युद्धों में जहां हजारों निर्दोष लोग अपनी जान गंवा रहे हैं, वहीं आर्थिक व्यवस्था और सामाजिक ढांचे पर भी बुरा असर पड़ा है। लेकिन इससे भी गंभीर और कम चर्चा में आने वाला पहलू है — पर्यावरणीय विनाश। एक नई स्टडी ने दुनिया को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि युद्ध सिर्फ ज़िंदगियां ही नहीं ले रहे, बल्कि धरती की सांसें भी घोंट रहे हैं।
यूके और अमेरिका के रिसर्चर्स की एक संयुक्त स्टडी के मुताबिक, युद्ध में इस्तेमाल हो रहे हथियार, टैंक, मिसाइलें और बम बड़े पैमाने पर कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य जहरीली गैसों का उत्सर्जन कर रहे हैं। साथ ही, जो इमारतें बमबारी में ढहाई जाती हैं, उनसे भी भारी मात्रा में ग्रीनहाउस गैसें निकलती हैं, जो वातावरण को लंबे समय तक नुकसान पहुंचाती हैं।
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बमों से निकला ज़हर, हवा में घुल रहा खतरा :
इस रिपोर्ट में सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा गाजा पट्टी पर हुई इजरायली बमबारी से जुड़ा है। रिसर्च के अनुसार, सिर्फ इस एक ऑपरेशन में करीब 713 टन कार्बन का उत्सर्जन हुआ। यह उत्सर्जन इतना अधिक है कि कई छोटे देश भी मिलकर इतनी मात्रा में प्रदूषण नहीं कर पाते। इसके अलावा, टैंकों और फाइटर जेट्स जैसे सैन्य संसाधनों से हजारों टन अतिरिक्त कार्बन वातावरण में घुल रहा है।
युद्ध की समाप्ति के बाद भी यह प्रदूषण वर्षों तक हवा, पानी और मिट्टी में बना रहता है, जिससे स्थानीय लोगों की सेहत, खेती और जल स्रोतों पर बुरा असर पड़ता है।
क्या है आगे की राह ?
पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि युद्ध के दौरान होने वाले "वॉर-टाइम कार्बन इमिशन" पर अब गंभीर वैश्विक चर्चा की जरूरत है। कई देश जलवायु परिवर्तन पर सम्मेलन करते हैं, कार्बन उत्सर्जन को कम करने की योजनाएं बनाते हैं, लेकिन युद्धों के इस अदृश्य कार्बन हमले पर किसी का ध्यान नहीं जाता।
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ऐसे में सवाल यह है कि क्या युद्ध के नाम पर दुनिया को जहरीला बनाया जाएगा? क्या कोई भी देश अपनी सीमाओं की रक्षा करते-करते पूरी धरती को नुकसान पहुंचाने का हकदार है?
युद्ध नहीं, संवाद ही है रास्ता :
आज जब हम ग्लोबल वॉर्मिंग, जल संकट और प्रदूषण से जूझ रहे हैं, ऐसे में युद्धों का बढ़ता प्रभाव स्थिति को और बदतर बना रहा है। यह समय है सैन्य ताकत से ज़्यादा कूटनीतिक समझदारी दिखाने का, ताकि सिर्फ इंसानों की ही नहीं, बल्कि धरती की भी रक्षा की जा सके। क्योंकि एक बार जब प्रकृति ही नष्ट हो जाएगी, तो कोई भी जीत मायने नहीं रखेगी।

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