मिडिल ईस्ट की आग में झुलसा रुपया; एक महीने में बड़ी गिरावट
मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव का असर अब सीधे भारतीय अर्थव्यवस्था पर दिखने लगा है। इजराइल द्वारा ईरान पर किए गए हमले के बाद दुनियाभर के शेयर बाजारों में गिरावट दर्ज की गई है, और इसी के साथ कच्चे तेल की कीमतों में भी तेजी आई है। इस भू-राजनीतिक संकट का सबसे तगड़ा असर भारतीय मुद्रा पर पड़ा, जहां रुपया डॉलर के मुकाबले 60 पैसे कमजोर होकर 86.20 पर पहुंच गया—जो एक महीने की सबसे बड़ी गिरावट मानी जा रही है।


मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव ने वैश्विक आर्थिक स्थिरता को गहरा झटका दिया है। 12 जून को इजराइल द्वारा ईरान की चार परमाणु लैब्स पर किए गए हमले के बाद दुनियाभर के शेयर बाजारों में उथल-पुथल मच गई है। इस हमले में ईरान की आर्मी के शीर्ष अधिकारियों और परमाणु वैज्ञानिकों के मारे जाने की खबर है, जिससे भू-राजनीतिक अस्थिरता और भी गहरी हो गई है। इसके प्रभाव सीधे भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी देखने को मिले हैं, जहां रुपया डॉलर के मुकाबले बड़ी गिरावट के साथ बंद हुआ है।
रुपया टूटा, शेयर बाजार में गिरावट
हमले के तुरंत बाद से ही भारतीय शेयर बाजार सहित वैश्विक बाजारों में बड़ी गिरावट देखने को मिली। निवेशकों के बीच भय का माहौल बना और इसके चलते सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर झुकाव बढ़ा। इसी बीच, शुक्रवार को भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले 60 पैसे कमजोर होकर 86.20 पर पहुंच गया, जो पिछले एक महीने में सबसे बड़ी गिरावट है। जानकारों का मानना है कि अगर यह युद्ध और लंबा चला, तो रुपया और कमजोर हो सकता है।
RBI का हस्तक्षेप और बाजार की चाल
हालांकि, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने बाजार में हस्तक्षेप कर रुपए को और ज्यादा गिरने से बचाया। व्यापारियों के अनुसार, डॉलर की बिकवाली और केंद्रीय बैंक की सक्रियता के चलते रुपया अंततः 86.08 पर बंद हुआ। यह गुरुवार के 85.60/$1 की तुलना में स्पष्ट गिरावट दर्शाता है, लेकिन स्थिति और बिगड़ने से बच गई। कारोबार के दौरान रुपया 86.20 से 85.93 के बीच झूलता रहा।
क्रूड ऑयल में उछाल से बढ़ा दबाव
इस भू-राजनीतिक संकट का असर सिर्फ शेयर और मुद्रा बाजार तक सीमित नहीं रहा। कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल आया है। शुक्रवार को ब्रेंट क्रूड 75 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया, जबकि एक दिन पहले यह 68 डॉलर पर था। यह लगभग 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी है, जो भारत जैसी तेल-आयातक अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का विषय है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, हर 10 डॉलर प्रति बैरल की वृद्धि से भारत का चालू खाता घाटा जीडीपी के 0.4 प्रतिशत तक बढ़ सकता है और खुदरा महंगाई दर में 35 आधार अंकों की बढ़ोतरी हो सकती है। इसका मतलब है कि आने वाले समय में पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ सकते हैं और महंगाई में नया उछाल देखा जा सकता है।
क्या आगे और बिगड़ेंगे हालात?
बाजार विश्लेषकों का मानना है कि इजराइल-ईरान टकराव अगर लंबा चलता है, तो इसका असर डॉलर की मांग, कच्चे तेल की कीमतों और मुद्रा विनिमय दर पर और अधिक गहराएगा। ऐसे में भारतीय रिजर्व बैंक को अतिरिक्त सावधानी बरतनी पड़ सकती है, ताकि रुपये की स्थिरता बनी रहे और देश की आर्थिक सेहत पर इसका सीधा असर न पड़े।

