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भारत का भविष्य खतरे में; यह आबादी है बड़े डिप्रेशन में
By EditorialPublished on
भारत में घटती जनसंख्या दर का नया संकेत: युवाओं की संख्या में आई गिरावट! संयुक्त राष्ट्र की ताज़ा विश्व जनसंख्या नीति 2025 की रिपोर्ट ने भारत को लेकर एक बड़ा संकेत दिया है। रिपोर्ट में बताया गया है कि देश में प्रजनन दर में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है। इस गिरती दर का सबसे बड़ा असर 0 से 14 वर्ष के आयु वर्ग पर पड़ा है, जिसकी आबादी में सबसे तेज़ कमी देखी गई है। यह गिरावट न सिर्फ जनसांख्यिकीय संतुलन को प्रभावित कर सकती है, बल्कि भविष्य में वर्कफोर्स, शिक्षा प्रणाली और आर्थिक संरचना पर भी गंभीर प्रभाव डाल सकत

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भारत, जो कभी जनसंख्या विस्फोट की वजह से दुनिया भर में चर्चा में रहता था, अब एक नए और चिंता जनक मोड़ पर खड़ा है। संयुक्त राष्ट्र की हालिया विश्व जनसंख्या नीति (SWOP) रिपोर्ट 2025 ने इस दिशा में चौंकाने वाला खुलासा किया है। रिपोर्ट के मुताबिक भारत की कुल प्रजनन दर (Fertility Rate) अब 1.9 पर पहुंच चुकी है, जो कि स्थिर जनसंख्या बनाए रखने के लिए जरूरी 2.1 के रिप्लेसमेंट लेवल से भी नीचे है।
क्या है रिप्लेसमेंट लेवल का मतलब ?
रिप्लेसमेंट लेवल वह दर होती है जिस पर हर मरने वाले व्यक्ति के बदले एक नया जीवन जन्म लेता है। अगर यह दर इससे नीचे चली जाए, तो इसका सीधा असर यह होता है कि देश की जनसंख्या धीरे-धीरे घटने लगती है। भारत जैसे विशाल और युवा देश के लिए यह गिरावट, भविष्य में कामकाजी आबादी और आर्थिक प्रगति के लिए खतरे की घंटी हो सकती है।
रिपोर्ट के आंकड़े क्या कहते हैं ?
संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 2025 के अंत तक भारत की कुल जनसंख्या 1.46 अरब तक पहुंच सकती है। हालांकि, इस वृद्धि के बावजूद जनसांख्यिकीय संतुलन बिगड़ता नजर आ रहा है। वर्तमान में भारत की आबादी में:
- 0–14 वर्ष के बच्चे – 24%
- 10–24 वर्ष के युवा – 26%
- 15–64 वर्ष के कामकाजी लोग – 68%
- बुजुर्ग (65+ वर्ष) – 7%
युवाओं की बड़ी संख्या अभी भारत की ताकत है, लेकिन यह धीरे-धीरे घट रही है। भविष्य में यही वर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित होगा।
कौन सी उम्र की आबादी हो रही है कम ?
सबसे ज्यादा गिरावट 0–14 वर्ष की उम्र वाले बच्चों की जनसंख्या में देखी गई है। यानी देश में जितने लोग मर रहे हैं, उतने नए जन्म नहीं हो रहे। यह गिरावट प्रजनन दर में आई कमी की वजह से है। अगर यही ट्रेंड जारी रहा, तो भारत में युवा और कामकाजी जनसंख्या घटेगी और बुजुर्गों का अनुपात बढ़ेगा।
क्या हो सकते हैं इसके परिणाम ?
विशेषज्ञों के मुताबिक यह गिरावट यदि समय रहते नहीं रोकी गई तो:
- आर्थिक उत्पादकता में गिरावट आ सकती है
- वर्कफोर्स की कमी हो सकती है
- बुजुर्ग आबादी की देखभाल के लिए ज्यादा संसाधनों की जरूरत होगी
- हेल्थकेयर और सोशल सिक्योरिटी सिस्टम पर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा
जैसा कि चीन और जापान में देखने को मिला है, एक समय पर अधिक बुजुर्ग और कम युवा होने से अर्थव्यवस्था पर भारी असर पड़ा। भारत भी उसी राह पर बढ़ता दिख रहा है।
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आगे की राह क्या होनी चाहिए ?
रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि भारत को अब प्रजनन दर बढ़ाने के लिए रणनीति बनानी होगी। युवाओं को परिवार शुरू करने के लिए सामाजिक और आर्थिक सहायता देनी होगी। साथ ही, बुजुर्गों की बढ़ती आबादी को देखते हुए नई सामाजिक सुरक्षा योजनाएं बनानी होंगी।
भारत अभी भी युवाओं का देश है, लेकिन यह ताकत स्थायी नहीं है। अगर प्रजनन दर और युवा आबादी पर ध्यान नहीं दिया गया, तो आने वाला कल बुजुर्गों का होगा – और देश को इसका सामना करने के लिए अभी से तैयार रहना होगा।

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