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SC का फैसला; 'पीड़िता अब पत्नी, रिश्ता खत्म करना अन्याय..'
By EditorialPublished on
सुप्रीम कोर्ट का भावनात्मक फैसला, अनुच्छेद 142 के तहत केस बंद सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को नाबालिग से यौन शोषण के एक संवेदनशील मामले में अहम फैसला सुनाया। जस्टिस अभय एस. ओका ने कहा कि कोर्ट संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत मिली विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए इस मामले को समाप्त कर रहा है। पीड़िता और आरोपी अब शादीशुदा हैं और एक बच्चे के माता-पिता भी हैं, ऐसे में कोर्ट ने मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए यह कदम उठाया है।

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सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक महत्वपूर्ण और भावनात्मक फैसले में नाबालिग से यौन उत्पीड़न के एक मामले में दोषी को राहत दी है। कोर्ट ने कहा कि वह संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत मिली विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए निचली अदालत में लंबित मुकदमे को बंद कर रहा है। यह फैसला सुप्रीम कोर्ट ने ‘न्याय के व्यापक हित’ को देखते हुए सुनाया।
यह निर्णय जस्टिस अभय एस. ओका ने अपने कार्यकाल के अंतिम दिन सुनाया। उन्होंने कहा कि जिस लड़की को कानून पीड़िता मानता है, वह खुद को ऐसा नहीं मानती। उल्टा, वह आरोपी से प्रेम करती है, दोनों ने शादी की है और उनका एक बच्चा भी है। जस्टिस ओका ने यह भी कहा कि इस लड़की को सबसे ज़्यादा पीड़ा कानूनी प्रक्रिया से हुई है, न कि उस व्यक्ति से जिसे कानून दोषी मान रहा है।
हाई कोर्ट का फैसला और विवाद :
इस मामले की शुरुआत 18 अक्टूबर 2023 को हुई थी, जब कलकत्ता हाई कोर्ट ने एक नाबालिग लड़की के यौन शोषण मामले में आरोपी युवक को बरी कर दिया था। हाई कोर्ट ने कहा था कि यह रिश्ता आपसी सहमति से बना था, और दोनों पक्षों ने शादी कर ली है। हालांकि, हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कई नैतिक टिप्पणियां भी की थीं, जिनमें कहा गया था कि "लड़कियों को अपनी यौन इच्छा पर नियंत्रण रखना चाहिए" और "लड़कों को लड़कियों की गरिमा का सम्मान करना चाहिए"। इन टिप्पणियों को लेकर व्यापक आलोचना हुई थी।
इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले का स्वतः संज्ञान लिया और इसे In Re: Right to Privacy of Adolescent के नाम से दर्ज किया। 20 अगस्त 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले को पलटते हुए आरोपी को पॉक्सो एक्ट के तहत दोषी ठहराया था। साथ ही, हाई कोर्ट की टिप्पणियों की कड़ी आलोचना की थी। कोर्ट ने तब सज़ा के मुद्दे पर फैसला टालते हुए एक कमिटी गठित की थी, जो इस मामले में विस्तृत रिपोर्ट दे।
कमिटी की रिपोर्ट और नया मोड़ :
अब जब कमिटी की रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट के सामने आई, तो उसमें यह बताया गया कि पीड़िता और आरोपी अब पति-पत्नी हैं और एक खुशहाल जीवन जीने की कोशिश कर रहे हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि यदि आरोपी को जेल भेजा गया, तो यह न केवल पीड़िता के जीवन को प्रभावित करेगा, बल्कि एक मासूम बच्चे को भी पिता से दूर कर देगा।
इस रिपोर्ट को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अपने पुराने आदेश को बदलते हुए निचली अदालत में चल रहे केस को समाप्त कर दिया। कोर्ट ने माना कि इस मामले में ‘न्याय के व्यापक हित’ और मानवीय दृष्टिकोण को प्राथमिकता देना अधिक उचित है।
न्याय और मानवता का संतुलन
यह फैसला न्यायपालिका के उस पहलू को उजागर करता है, जहां कानून के अक्षर से ज्यादा उसके उद्देश्य और मानवीय संवेदनाओं को महत्व दिया जाता है। हालांकि यह एक अपवाद स्वरूप फैसला है, लेकिन यह संकेत भी देता है कि कोर्ट जरूरी होने पर संवैधानिक शक्तियों का उपयोग कर न्याय की नई परिभाषा गढ़ सकता है।

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