CJI विरुद्ध PIL दायर करना पड़ा महंगा; कोर्ट ने ठोका जुर्माना
मुख्य न्यायाधीश भूषण रामाकृष्ण गवई (CJI BR Gavai) ने उस याचिका को सिरे से खारिज कर दिया है जिसमें उनके ही हालिया दौरे के दौरान प्रोटोकॉल उल्लंघन का मुद्दा उठाया गया था। सुप्रीम कोर्ट में दाखिल इस पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन (PIL) को अदालत ने “पब्लिसिटी इंटरेस्ट लिटिगेशन” करार देते हुए याचिकाकर्ता को जमकर फटकार लगाई और ₹7000 का जुर्माना भी लगाया।
CJI गवई की कड़ी टिप्पणी :
सीजेआई गवई ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि, "यह याचिका जनहित के नाम पर सिर्फ सस्ती लोकप्रियता और अखबारों में नाम छपवाने के मकसद से दाखिल की गई है। यह जनहित याचिका नहीं बल्कि 'पब्लिसिटी इंटरेस्ट लिटिगेशन' है।” उन्होंने कहा कि अदालत का कीमती समय ऐसे निराधार और राजनीतिक मकसद से प्रेरित मामलों में नहीं गंवाया जा सकता।
याचिका का संदर्भ: महाराष्ट्र दौरे पर प्रोटोकॉल का सवाल :
यह मामला 18 मई का है, जब CJI गवई महाराष्ट्र दौरे पर मुंबई पहुंचे थे। उस वक्त राज्य के मुख्य सचिव, पुलिस महानिदेशक (DGP) और मुंबई पुलिस कमिश्नर जैसे शीर्ष अधिकारी एयरपोर्ट पर उनकी अगवानी के लिए मौजूद नहीं थे। इसे लेकर कुछ मीडिया रिपोर्ट्स और हलकों में इसे प्रोटोकॉल का उल्लंघन बताया गया।
हालांकि, बाद में उसी दिन हुए एक अन्य कार्यक्रम में इन तीनों अधिकारियों की मौजूदगी दर्ज की गई थी, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि जानबूझकर कोई अवमानना नहीं हुई थी।
अदालत का रुख: न्यायपालिका की गरिमा से खिलवाड़ नहीं :
सुप्रीम कोर्ट ने यह कहते हुए याचिका खारिज की कि इस प्रकार की याचिकाएं न्यायपालिका की गरिमा को नुकसान पहुंचाने और उसे राजनीतिक बहस का हिस्सा बनाने की कोशिश करती हैं। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि अगर वास्तव में कोई गंभीर प्रशासनिक चूक हुई होती, तो अदालत खुद संज्ञान लेती, लेकिन यह मामला ऐसा कतई नहीं है।
चेतावनी: जनहित याचिका का दुरुपयोग न हो
CJI गवई ने कहा कि जनहित याचिका एक गंभीर और संवेदनशील माध्यम है, जिसे आम जनता की वास्तविक समस्याओं के समाधान के लिए प्रयोग किया जाना चाहिए — न कि व्यक्तिगत या राजनीतिक प्रचार के लिए। उन्होंने कहा, "इस तरह की याचिकाएं कोर्ट के संसाधनों का दुरुपयोग हैं और इससे उन लोगों को नुकसान होता है जो वास्तव में न्याय की उम्मीद लेकर अदालत पहुंचते हैं।"
इस मामले से एक बार फिर यह स्पष्ट हो गया है कि सुप्रीम कोर्ट जनहित याचिकाओं के नाम पर दाखिल होने वाली सतही और प्रचार-प्रधान याचिकाओं को बर्दाश्त नहीं करेगा। यह निर्णय भविष्य के लिए एक सख्त संदेश है कि अदालत का दुरुपयोग करने वालों को न केवल कानूनी बल्कि आर्थिक दंड का भी सामना करना पड़ेगा। यदि जनहित में न्याय की उम्मीद हो, तो उसे तथ्यों और तर्कों के साथ सामने लाया जाए—वरना न्यायपालिका इसे प्रचार की नौटंकी मानकर सख्त कार्रवाई करेगी।
Editorial

Editorial

Next Story