India’s Friend Shakes Economy, You’ll Feel It
ईरान और इजरायल के बीच लगातार बढ़ता तनाव अब अंतरराष्ट्रीय बाजार और वैश्विक राजनीति में हलचल पैदा कर रहा है। दोनों देशों के बीच तनातनी इस कदर बढ़ चुकी है कि इजरायल की तरफ से ईरान के परमाणु ठिकानों पर संभावित सैन्य कार्रवाई की खबरें सामने आ रही हैं। इस खबर का सीधा असर अंतरराष्ट्रीय क्रूड ऑयल मार्केट पर देखने को मिला है, जहां तेल की कीमतों में तेजी से उछाल आया है।
बढ़ती तेल की कीमतें – भारत के लिए खतरे की घंटी :
इंटरनेशनल मार्केट में वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) क्रूड और ब्रेंट क्रूड, दोनों में ही 1.06 प्रतिशत से ज्यादा का उछाल देखा गया है। तेल की कीमतें 66 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गई हैं, जबकि हाल ही में ये 60 डॉलर से नीचे आ गई थीं। इसका सीधा अर्थ है – भारत जैसे तेल आयातक देशों पर महंगाई का अतिरिक्त बोझ। भारत अपनी जरूरत का लगभग 85% कच्चा तेल आयात करता है, जिसमें सबसे बड़ा हिस्सा मध्य-पूर्व के देशों से आता है।
क्यों बढ़ेगा भारत में महंगाई का संकट ?
मध्य-पूर्व, विशेष रूप से सऊदी अरब, इराक, कतर, यूएई और कुवैत जैसे देश भारत को कच्चे तेल की आपूर्ति करते हैं। ईरान और इजरायल के बीच युद्ध की स्थिति बनती है तो यह तनाव इन देशों तक भी पहुंच सकता है। ऐसे में तेल उत्पादन और आपूर्ति प्रभावित होगी, जिससे ग्लोबल सप्लाई चेन बाधित होगी। जब आपूर्ति घटेगी और मांग जस की तस बनी रहेगी, तो स्वाभाविक है कि कीमतों में उछाल आएगा। यही उछाल भारत में पेट्रोल-डीजल से लेकर ट्रांसपोर्टेशन और खाद्य वस्तुओं की कीमतों तक असर डालेगा।
भारत की अर्थव्यवस्था पर असर :
भारत और वेस्ट एशिया के बीच ट्रेड का आंकड़ा लगभग 195 अरब डॉलर का है। इनमें से अधिकांश व्यापार ऊर्जा, पेट्रोलियम उत्पादों और प्राकृतिक गैस पर केंद्रित है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा कच्चे तेल का आयातक देश है। वित्त वर्ष 2022-23 में भारत ने लगभग 137 अरब डॉलर का कच्चा तेल आयात किया था, जबकि इससे पिछले वर्ष यह आंकड़ा 133.4 अरब डॉलर था। अगर कीमतें इसी तरह बढ़ती हैं तो भारत के तेल आयात बिल में कई अरब डॉलर की वृद्धि हो सकती है, जिससे चालू खाता घाटा और मुद्रा भंडार पर भी सीधा असर पड़ेगा।
प्रवासी कामगारों और रेमिटेंस पर असर :
गौर करने वाली एक और अहम बात यह है कि खाड़ी देशों में लाखों भारतीय कामगार काम करते हैं। 2023 के दिसंबर तक भारत को यूएई, सऊदी अरब, ओमान, कतर, बहरीन और कुवैत जैसे देशों से लगभग 120 अरब अमेरिकी डॉलर की विदेशी मुद्रा प्राप्त हुई थी। ये रकम अधिकतर प्रवासी भारतीयों की तरफ से रेमिटेंस के रूप में आती है। अगर युद्ध के हालात बनते हैं, तो इन देशों में रह रहे भारतीय कामगारों की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है, और उन्हें वापस लाना भारत सरकार के लिए एक नया चुनौतीपूर्ण मिशन बन जाएगा। इससे रेमिटेंस पर भी असर होगा, जो भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक अहम स्तंभ है।
लाल सागर के रास्ते पर भी खतरा
मध्य-पूर्व में तनाव का एक और गंभीर प्रभाव लाल सागर की सुरक्षा पर पड़ सकता है। लाल सागर व्यापार के लिहाज से एक बेहद महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है, जिससे होकर भारत का यूरोप, अमेरिका, अफ्रीका और वेस्ट एशिया के साथ अधिकतर समुद्री व्यापार होता है। यदि लाल सागर क्षेत्र में असुरक्षा बढ़ती है या यहां मिलिट्री प्रेजेंस तेज होती है, तो वहां से गुजरने वाले जहाजों की आवाजाही प्रभावित हो सकती है। इससे ट्रांसपोर्टेशन कॉस्ट बढ़ेगी, शिपिंग टाइम डिले होगा और भारत के वैश्विक व्यापार पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।
भारत के लिए रणनीतिक और कूटनीतिक चुनौती :
भारत के लिए यह परिस्थिति केवल आर्थिक नहीं, बल्कि कूटनीतिक रूप से भी चुनौतीपूर्ण बन सकती है। एक ओर इजरायल भारत का घनिष्ठ सहयोगी है, खासकर रक्षा और तकनीकी मामलों में, वहीं ईरान भी भारत के लिए सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा है – चाहे वह चाबहार पोर्ट हो या अफगानिस्तान से संपर्क के लिए वैकल्पिक मार्ग।
ईरान-इजरायल तनाव अगर युद्ध में तब्दील होता है, तो भारत को बहुआयामी नुकसान झेलना पड़ सकता है – महंगाई में इजाफा, तेल आपूर्ति में संकट, रेमिटेंस में गिरावट और व्यापार पर दबाव। ऐसे में भारत के लिए यह जरूरी हो जाएगा कि वह मध्य-पूर्व के हालात पर करीबी नजर बनाए रखे और अपने ऊर्जा स्रोतों को विविधीकृत करने की कोशिश करे, ताकि किसी भी एक क्षेत्रीय संकट से उसकी अर्थव्यवस्था को गहरा झटका न लगे।
Editorial

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