सुनवाई शुरू होते ही भिड़े सिब्बल और SG मेहता

वक्फ संशोधन अधिनियम 2023 को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार, 20 मई 2025 को सुनवाई शुरू होते ही केंद्र और याचिकाकर्ताओं के बीच तीखी बहस छिड़ गई। मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश भूषण रामाकृष्ण गवई की अध्यक्षता वाली पीठ कर रही थी।

केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने प्रारंभ में आपत्ति जताते हुए कहा कि पिछली सुनवाई में अदालत ने तीन विशिष्ट मुद्दों वक्फ बोर्ड की नियुक्ति, वक्फ बाय यूजर की वैधता, और सरकारी संपत्ति की पहचान पर जवाब दाखिल करने को कहा था। उन्होंने आरोप लगाया कि याचिकाकर्ताओं ने इन तीन मुद्दों के अलावा कई अन्य मुद्दे उठाकर अदालत की दिशा का उल्लंघन किया है। मेहता ने आग्रह किया कि बहस को इन्हीं तीन मुद्दों तक सीमित रखा जाए।

वहीं, याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने इसका जोरदार विरोध किया। उन्होंने कहा कि अदालत के आदेश में कहीं भी यह नहीं कहा गया है कि अंतरिम राहत की सुनवाई केवल इन्हीं तीन मुद्दों पर सीमित रहेगी। सिब्बल ने स्पष्ट किया कि पिछली सुनवाई में इन मुद्दों की चर्चा जरूर हुई थी, परंतु किसी प्रकार की सीमा तय नहीं की गई थी।

सुप्रीम कोर्ट ने इस विवाद पर सिब्बल की दलील से सहमति जताई। मुख्य न्यायाधीश की पीठ ने स्पष्ट किया कि अदालत के किसी आदेश में मुद्दों को सीमित करने की बात नहीं कही गई है। कोर्ट की यह टिप्पणी याचिकाकर्ताओं के पक्ष में जाती दिख रही है और इससे सुनवाई के दायरे में विस्तार की संभावना भी बढ़ गई है।

यह मामला संवेदनशील है क्योंकि वक्फ अधिनियम में संशोधन के जरिए वक्फ बोर्ड को दी गई शक्तियों, संपत्ति की पहचान और कब्जे से जुड़े मुद्दों पर कई पक्षों को आपत्ति है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह कानून संपत्ति के अधिकारों का उल्लंघन करता है और संविधान के अनुच्छेदों के खिलाफ है।

अब अगली सुनवाई में अदालत यह तय करेगी कि बहस किन बिंदुओं पर केंद्रित रहेगी, और क्या याचिकाकर्ताओं को व्यापक मुद्दे उठाने की अनुमति दी जाएगी या नहीं। आने वाले दिनों में यह मामला संवैधानिक और राजनीतिक रूप से और भी अहम हो सकता है।

Editorial

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