उत्तराखंड पाठ्यक्रम में मोड़; मदरसों में ‘ऑपरेशन सिंदूर’!
उत्तराखंड मदरसा बोर्ड ने एक ऐतिहासिक और साहसी निर्णय लेते हुए राज्य के मदरसों के पाठ्यक्रम में “ऑपरेशन सिंदूर” को शामिल करने की घोषणा की है। यह निर्णय देशभक्ति की भावना को मज़बूत करने और छात्रों को भारतीय सेना की वीरता से अवगत कराने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
मदरसा बोर्ड के अध्यक्ष शगुन कासमी ने इस निर्णय की जानकारी देते हुए कहा कि ऑपरेशन सिंदूर को मदरसा पाठ्यक्रम में शामिल करने का उद्देश्य यह है कि बच्चे सिर्फ धार्मिक ही नहीं, बल्कि समसामयिक राष्ट्रीय घटनाओं से भी जुड़ें और देश की रक्षा के लिए दिए गए बलिदानों को समझें। उन्होंने बताया कि यह निर्णय मौजूदा शिक्षा सत्र 2025-26 से लागू किया जाएगा।
क्या है ऑपरेशन सिंदूर ?
ऑपरेशन सिंदूर भारतीय सेना द्वारा किया गया एक साहसिक और जवाबी सैन्य अभियान था, जिसे जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद अंजाम दिया गया था। इस हमले में कई निर्दोष पर्यटकों की जान चली गई थी। इसके बाद भारतीय सेना ने पाकिस्तान में घुसकर इस कायराना हरकत का करारा जवाब दिया था। इस ऑपरेशन के तहत आतंकियों के ठिकानों को ध्वस्त कर उन्हें मुंहतोड़ जवाब दिया गया, जिससे देशवासियों का मनोबल और सेना का गौरव दोनों बढ़ा।
मदरसा बोर्ड अध्यक्ष की भावनात्मक अपील :
शगुन कासमी ने एबीपी लाइव से बातचीत में कहा, “ऑपरेशन सिंदूर भारत की सैन्य ताकत और रणनीतिक चातुर्य का उदाहरण है। यह एक ऐसा अध्याय है जिसे हर भारतीय बच्चे को जानना चाहिए — चाहे वह किसी भी पृष्ठभूमि से आता हो। जब हमारी सेना देश के दुश्मनों को मुंहतोड़ जवाब देती है, तो हमें गर्व महसूस होता है। तो फिर क्यों न हम अपने बच्चों को यह सिखाएं?”
उन्होंने आगे कहा, “हमारा मकसद है कि मदरसों में पढ़ने वाले छात्र सिर्फ धार्मिक ज्ञान तक सीमित न रहें, बल्कि वे भी देश की सुरक्षा, वीरता और बलिदान की कहानियों को जानें और उनसे प्रेरित हों। ऑपरेशन सिंदूर को शामिल करना उसी दिशा में एक कदम है।”
सिलेबस में क्या बदलेगा ?
मदरसा बोर्ड के अनुसार, ऑपरेशन सिंदूर को इतिहास और समसामयिक घटनाओं के अध्याय में शामिल किया जाएगा। छात्रों को इसके तहत भारतीय सेना की रणनीति, ऑपरेशन की आवश्यकता, इसके परिणाम और राष्ट्रीय प्रभाव जैसे पहलुओं को पढ़ाया जाएगा। साथ ही यह भी बताया जाएगा कि कैसे इस ऑपरेशन ने आतंकवाद के खिलाफ भारत की नीति को एक नया स्वरूप दिया।
सकारात्मक पहल का स्वागत :
शिक्षा विशेषज्ञों और कई सामाजिक संगठनों ने इस निर्णय का स्वागत किया है। उनका मानना है कि इससे न केवल बच्चों में देशभक्ति की भावना मजबूत होगी, बल्कि मुस्लिम समाज के अंदर एक सकारात्मक राष्ट्र निर्माण की सोच को भी बल मिलेगा। साथ ही यह कदम उस धारणा को भी तोड़ेगा कि मदरसों में केवल धार्मिक शिक्षा दी जाती है।
राजनीतिक प्रतिक्रिया का इंतजार :
हालांकि, यह निर्णय शिक्षा क्षेत्र में क्रांतिकारी माना जा रहा है, लेकिन राजनीतिक हलकों में इस पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं आ सकती हैं। फिलहाल राज्य सरकार और शिक्षा विभाग की तरफ से इस फैसले को लेकर कोई आपत्ति नहीं जताई गई है।
यह कदम न सिर्फ उत्तराखंड के मदरसों के लिए एक नई शुरुआत है, बल्कि यह पूरे देश में मदरसा शिक्षा के आधुनिकीकरण और राष्ट्रवादी दृष्टिकोण को बढ़ावा देने की दिशा में एक मिसाल बन सकता है।
Editorial

Editorial

Next Story