Tariff Titans: Will China or America Blink First?
पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की वापसी की चर्चाओं के बीच उनकी आक्रामक टैरिफ नीति एक बार फिर सुर्खियों में है। उनके रेसिप्रोकल टैरिफ के फैसले ने न केवल चीन, भारत और वियतनाम जैसे देशों को चौंका दिया है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी खलबली मचा दी है। टैरिफ के इस भारी भरकम बोझ के कारण अमेरिकी स्टॉक मार्केट सोमवार को क्रैश हो गया, और एक ही दिन में कई बिलियन डॉलर की पूंजी बाजार से साफ हो गई।
अमेरिका के लिए वरदान या संकट?
ट्रंप की रणनीति का मकसद अमेरिका में विदेशी निवेश को बढ़ावा देना और घरेलू उत्पादों को बढ़ावा देना है। लेकिन द गार्जियन की रिपोर्ट के मुताबिक, ये लक्ष्य उतना आसान नहीं जितना दिखता है। सीएनएन की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि नई टैरिफ पॉलिसी से अमेरिकी कंपनियों को हर साल करीब 654 बिलियन डॉलर का अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ सकता है, जिससे उत्पादन लागत में तेज़ इज़ाफा होगा और उपभोक्ताओं पर महंगाई का बोझ पड़ेगा। जेपी मॉर्गन और गोल्डमैन सैक्स जैसी वित्तीय संस्थाओं ने आगाह किया है कि अगर ये टैरिफ वॉर लंबा चला, तो अमेरिका को मंदी का सामना करना पड़ सकता है।
चीन पर कितना असर ?
ट्रंप की नीति का सीधा निशाना चीन भी है। CSIS की रिपोर्ट के अनुसार, अगर अमेरिका अपने टैरिफ में और वृद्धि करता है, तो 2025 तक चीन की जीडीपी वृद्धि दर में 2.4 फीसदी की गिरावट आ सकती है। अमेरिकी बाज़ार में चीनी उत्पादों की हिस्सेदारी काफी बड़ी है, और अगर ट्रंप ने इन पर 50 फीसदी तक का टैरिफ लगा दिया, तो चीन के लिए अमेरिकी बाजार में टिके रहना बेहद मुश्किल हो जाएगा। वहीं, चीन भी चुप नहीं बैठा है। उसने 10 अप्रैल से अमेरिकी सामानों पर 34 फीसदी की जवाबी टैरिफ लगाने की घोषणा कर दी है, जिससे टिट-फॉर-टैट की स्थिति बन गई है और व्यापारिक युद्ध के संकेत तेज हो गए हैं।
ट्रंप की टैरिफ पॉलिसी एक दोधारी तलवार बन गई है। एक ओर इससे अमेरिका घरेलू उत्पादों को बढ़ावा देना चाहता है, लेकिन दूसरी ओर इससे खुद उसकी अर्थव्यवस्था पर भी भारी दबाव पड़ सकता है। अब देखना ये है कि इस टैरिफ वॉर में जीत किसकी होगी और नुकसान किसका ज्यादा?
Editorial

Editorial

Next Story