सुप्रीम कोर्ट को सारी ताकत देना खतरनाक, ऐसा क्यो बोले उपराष्ट्रपति धनखड़?
भारत के उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने हाल ही में एक बड़ा और महत्वपूर्ण बयान दिया है। उन्होंने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को वीटो पावर नहीं दी जानी चाहिए। उपराष्ट्रपति का मानना है कि अगर देश की सबसे बड़ी अदालत के मुख्य न्यायाधीश को सारी शक्तियाँ दे दी गईं, तो यह देश के लोकतांत्रिक तंत्र और संविधान की संरचना के लिए खतरनाक साबित हो सकता है।

उनके इस बयान ने एक बार फिर से न्यायपालिका की स्वतंत्रता, वीटो पावर और संविधान में शक्ति के संतुलन को लेकर बहस को तेज कर दिया है। आइए जानते हैं कि आखिर उपराष्ट्रपति ने ऐसा क्यों कहा, वीटो पावर क्या होती है, और इससे देश में क्या खतरे पैदा हो सकते हैं।
📌 वीटो पावर क्या होती है? (What is Veto Power?)
वीटो पावर का मतलब है — किसी प्रस्ताव या निर्णय को अस्वीकार करने या रोकने का विशेष अधिकार। यह शक्ति आमतौर पर राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सदस्य देशों या किसी उच्च अधिकारी के पास होती है। अगर किसी को वीटो पावर दी जाती है, तो वह अपने अधिकार का इस्तेमाल करके किसी भी निर्णय को रोक सकता है या उस पर अंतिम फैसला ले सकता है।
अगर चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) को यह वीटो पावर दी जाती है, तो इसका मतलब होगा कि वे सुप्रीम कोर्ट या न्यायिक मामलों में अंतिम और निर्णायक शक्ति रखते होंगे। वे किसी भी न्यायिक आदेश या फैसले को रोक सकते हैं या उसमें बदलाव कर सकते हैं।
📌 उपराष्ट्रपति का बयान क्यों महत्वपूर्ण है?
उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने इस विषय पर अपनी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि
"अगर सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को सारी शक्ति दे दी जाएगी, तो यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक साबित हो सकता है। देश में न्यायपालिका को स्वतंत्र रूप से कार्य करना चाहिए, लेकिन उसका दायरा और संतुलन बना रहना भी उतना ही ज़रूरी है।"
यह बयान इसलिए अहम है क्योंकि देश में न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच अधिकारों के संतुलन की बहस लंबे समय से चल रही है। उपराष्ट्रपति ने साफ कहा कि किसी एक संस्था या व्यक्ति के पास सारी शक्ति देना संविधान के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।
📌 खतरे क्या हैं? (What Are the Risks?)
उपराष्ट्रपति धनखड़ ने इस स्थिति को खतरनाक इसलिए बताया क्योंकि:
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अगर CJI के पास वीटो पावर आ जाती है, तो वे किसी भी न्यायिक निर्णय को अपने हिसाब से बदल या रोक सकते हैं।
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इससे न्यायपालिका में एकाधिकार की स्थिति पैदा हो सकती है।
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वीटो पावर का दुरुपयोग होने की संभावना बढ़ जाती है।
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इससे न्यायपालिका की निष्पक्षता पर सवाल खड़े हो सकते हैं।
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संविधान द्वारा तय किए गए सत्ता के संतुलन (Separation of Powers) का उल्लंघन हो सकता है।
📌 न्यायपालिका की स्वतंत्रता क्यों ज़रूरी है?
उपराष्ट्रपति ने अपने बयान में न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर भी ज़ोर दिया।
उन्होंने कहा कि देश में न्यायपालिका को स्वतंत्र रूप से काम करने का अधिकार है ताकि:
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कोई भी राजनीतिक, सामाजिक या बाहरी दबाव उसके फैसलों को प्रभावित न कर सके।
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सभी नागरिकों को निष्पक्ष और समान न्याय मिले।
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संविधान और क़ानून के अनुसार निष्पक्ष निर्णय लिए जा सकें।

