होलिका दहन 2025: जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और धार्मिक महत्व
होलिका दहन 2025: जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और धार्मिक महत्वनई दिल्ली। होलिका दहन का पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है। यह पर्व फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है और इसके अगले दिन रंगों की होली खेली जाती है। 2025 में होलिका द
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होलिका दहन 2025: जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और धार्मिक महत्व
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नई दिल्ली। होलिका दहन का पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है। यह पर्व फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है और इसके अगले दिन रंगों की होली खेली जाती है। 2025 में होलिका दहन का शुभ मुहूर्त और पूजा विधि को लेकर श्रद्धालु काफी उत्सुक हैं। आइए जानते हैं इस पावन पर्व से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियाँ।
होलिका दहन 2025 का शुभ मुहूर्त
हिंदू पंचांग के अनुसार, होलिका दहन 13 मार्च 2025, गुरुवार को मनाया जाएगा। पूर्णिमा तिथि 13 मार्च को सुबह 10:35 बजे से शुरू होकर 14 मार्च को दोपहर 12:23 बजे तक रहेगी। धार्मिक मान्यता के अनुसार, होलिका दहन भद्रा काल समाप्त होने के बाद किया जाता है।
शुभ मुहूर्त: रात 11:26 बजे से 12:18 बजे तक
होलिका दहन की पूजा विधि
शुद्धि और संकल्प – होलिका दहन से पहले स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल को गंगाजल से शुद्ध करें।
होलिका की स्थापना – किसी खुले स्थान पर होलिका और प्रह्लाद की प्रतिमा स्थापित करें।
सामग्री एकत्रित करें – पूजा के लिए गोबर के उपले, लकड़ियाँ, सूखा घास, फूल, रोली, चावल, गंगाजल, हल्दी, नारियल और मिठाई रखें।
होलिका पूजन – होलिका की पूजा करें और सूत के धागे से सात बार परिक्रमा करें।
आहुति और दहन – अग्नि प्रज्वलित करें और जौ, गेंहू, नारियल, मिठाई और गुड़ की आहुति दें।
प्रदक्षिणा और आशीर्वाद – परिवार के सदस्य होलिका की परिक्रमा करें और राख को घर में सुरक्षित स्थान पर रखें। यह राख शुभ मानी जाती है।
होलिका दहन का धार्मिक और ज्योतिषीय महत्व
होलिका दहन को लेकर अनेक धार्मिक कथाएँ प्रचलित हैं, जिनमें सबसे प्रमुख कथा भक्त प्रह्लाद और उसकी बुआ होलिका की है। कथा के अनुसार, असुरराज हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र प्रह्लाद को भगवान विष्णु की भक्ति करने से रोकने के लिए उसे मारने का प्रयास किया। उसने अपनी बहन होलिका को आदेश दिया, जिसे वरदान था कि वह अग्नि में नहीं जलेगी। वह प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठ गई, लेकिन भगवान विष्णु की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित बच गया और होलिका जलकर भस्म हो गई। तभी से यह पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक बन गया।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, होलिका दहन नकारात्मक ऊर्जा को समाप्त करता है और नए शुभ कार्यों के लिए सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है। इस दिन ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति विशेष होती है, जिससे जीवन में सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
होलिका दहन के लाभ और परंपराएँ
नकारात्मक ऊर्जा से मुक्ति – घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है और नकारात्मक शक्तियाँ दूर होती हैं।
बीमारियों से बचाव – होलिका दहन की अग्नि के चारों ओर परिक्रमा करने से रोगों से बचाव होता है।
भय से मुक्ति – यह पर्व भय, तनाव और मानसिक अशांति से मुक्ति दिलाने में सहायक माना जाता है।
देशभर में होलिका दहन की परंपराएँ
भारत के विभिन्न राज्यों में होलिका दहन को अलग-अलग तरीकों से मनाया जाता है।
उत्तर भारत में – यहाँ बड़े स्तर पर होलिका दहन का आयोजन किया जाता है और इसके अगले दिन धूमधाम से होली खेली जाती है।
मध्य प्रदेश और राजस्थान में – पारंपरिक गीत-संगीत के साथ होलिका पूजन किया जाता है।
बिहार और झारखंड में – यहाँ होलिका की राख को घर लाकर तिलक लगाने की परंपरा है।
होलिका दहन के समय करें ये उपाय
आर्थिक समृद्धि के लिए – होलिका की अग्नि में 11 गुड़ की भेली और 5 लौंग डालें।
स्वास्थ्य लाभ के लिए – जलती हुई होलिका की परिक्रमा करते समय 7 बार गुड़ और गेंहू डालें।
शत्रु बाधा निवारण के लिए – सरसों के दाने और काले तिल जलती होलिका में अर्पित करें।
निष्कर्ष
होलिका दहन केवल एक धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं, बल्कि यह सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से भी महत्वपूर्ण पर्व है। इस दिन की गई पूजा-अर्चना और शुभ कार्यों का विशेष फल प्राप्त होता है। यह पर्व हमें सिखाता है कि अहंकार और अधर्म का अंत निश्चित है और सत्य की हमेशा जीत होती है।

