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जयपुर (कासं)। धर्मतीर्थ अतिशय क्षेत्र के निकट धर्मनगरी आडूल में परम पूज्य प्रज्ञायोगी दिगम्बर जैनाचार्य गुप्सिनंदी जी गुरुदेव (Digambar Jainacharya Gupshinandi Ji Gurudev) ने पर्यूषण पर्व (paryooshan parv) के नौवें दिन उत्तम आकिंचन धर्म पर अपनी मधुर वाणी में कहा कि उत्तम आकिंचन्य धर्म आत्मा की उस अवस्था का नाम है जहाँ पर बहिरंग सब कुछ तो छूट ही जाता है साथ में अंतरंग के संकल्पों की प्रक्रिया को भी विश्राम मिलता है। बाह्य परिग्रह त्याग के बाद भी मैं और मेरेपन का बोझ निरन्तर चलता है।
समता भाव को प्राप्त करने के लिए परिग्रह, त्याग आवश्यक है। परिग्रह के प्रति आदर भाव अनर्थ का मूल है। अंतरंग भाव शुद्धि के लिए बाह्य परिग्रह त्याग किया जाता हैं, लेकिन अंतरंग शुद्धि के बिना बाह्य त्याग निष्फल है। संसार में समस्त संकटों का मूल अंहकार है। हम ममकार रूप में मूर्च्छा भाव से बचने के लिए एवं आकिंचन धर्म की प्राप्ति के लिए कर्तव्य बुद्धि, पर्याय बुद्धि का त्याग अनिवार्य है। पर पदार्थ का कर्ता स्वयं को मानना कर्तव्य बुद्धि है जैसे पुत्र शिष्य आदि को अपना मानना स्वयं को उनका निर्माता मानना कर्त्तव्य बुद्धि है। मैं धनवान हु. मैं सुंदर हूँ. मैं बलवान हूँ इत्यादि पर्याय में आत्मबुद्धि का होना पर्याय बुद्धि है।
यह घर परिवार, मंदिर, रूप मकान, मोटरगाड़ी, बंगला आदि मेरा है इत्यादि रूप पृथक पर पदार्थों में आत्मबुद्धि का होना सम्बद्ध बुद्धि है। सारांशतः जो प्रत्यक्ष में भेद रूप है, पृथक है उन्हें आत्मा से अभिन्न मानना सम्बद्ध बुद्धि है। इन तीनों के परिहार के बाद ही उत्तम आकिंचन की ज्योति का उद्घाटन होता है। सघन बादल के समान ये तीनों बुद्धियाँ, आकिंचन सूर्य के तेज को ढक देती है। पहाड़ चिर बसंत की स्थापना करने वाला आकिंचन धर्म ही है। जैसे बसंत ऋतु आती है उसके पहले पतझड़ भी अनिवार्य रूप से आता है। इसी प्रकार यदि हम की चोटी पर पहुँचने के लिए हमें भार रहित हल्का होना जरूरी होता है। उसी प्रकार सिद्धालय की पवित्र ऊँचाई पर पहुँचने के लिए हमें आकिंचन अर्थात एकदम निर्विकल्प होना अनिवार्य है। सूखी तुम्बी में यद्यपि पानी में तैरने की क्षमता है किन्तु मिट्टी का लेप लगने पर वह जैसे पानी के तल में चली जाती है। उसी प्रकार संकल्प विकल्प रूप कर्त्तव्य भावों से यह जीवात्मा संसार में डूबता रहता है। परिग्रह का परित्याग कर परिणामों को आत्मकेन्द्रित करना ही आकिंचन धर्म की मुख्य धारा है। हमारे जीवन में स्थायी सुख के रूप में अंतर्मन में चिर बसंत की स्थापना करना चाहते हैं तो पतझड़ को न भूलें। सूखे पत्तों के समान जो क्रोध, मान, माया, लोभ आदि हैं उनका पतझड़ होने के बाद ही बसंत के समान आह्लादकारी उस आकिंचन धर्म की प्राप्ति हो सकती है। आत्मा के विकास की चरम सीमा आकिंचन्य धर्म है।
आकिंचन्य धर्म को धारने वाला लौकिक सुख को नहीं चाहता है फिर भी पुण्योदय से उसे अंतरंग वैभव (केवलज्ञान। आदि) के साथ बाह्य वैभव समवशरण की विभूति का स्वामित्व स्वयंमेव प्राप्त हो जाता है। सम्यक तप के प्रभाव से मिट्टी भी सोना बन जाती है।। शुभचन्द्राचार्य और भतृहरि दो । भाई थे। :
Editorial

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