meat ban Paryushana
मुंबई । मुंबई उच्च न्यायालय (Mumbai High Court) ने गुरुवार को राज्य के सभी नगरपालिकाओं को निर्देश जारी किया है कि वे जैन समुदाय के विभिन्न धर्मार्थ ट्र्स्टों द्वारा प्रस्तुत किए गए ज्ञापनों पर तत्काल निर्णय लें, जिसमें की पर्युषण (Paryushana) पर्व के मद्देनजर पशुओं के वध और मांस की बिक्री पर अस्थायी रोक लगाने की मांग निहीत है।
मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति अमित बोरकर की उच्च न्यायालय की खंडपीठ शेठ मोतीशॉ लालबाग जैन चैरिटीज द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी। उच्च न्यायालय ने कहा कि अभ्यावेदन पर कानून और विभिन्न अदालतों के निर्णयों के अनुसार निर्णय लिया जाना चाहिए, जिन्होंने इस मुद्दे पर पहले फैसला सुनाया था।
याचिकाकर्ता, महाराष्ट्र पब्लिक ट्रस्ट अधिनियम, 1950 के तहत पंजीकृत एक सार्वजनिक धर्मार्थ ट्रस्ट है, जो जैन धर्म के अनुयायियों और 30 अन्य जैन धर्मार्थ ट्रस्टों का प्रतिनिधित्व करता है, ने बीएमसी और अन्य नागरिक निकायों को 31 अगस्त से 7 सितंबर के बीच पर्युषण पर्व के दौरान पशुओं के वध पर अस्थायी प्रतिबंध लगाने की मांग की थी।
याचिकाकर्ता ने वरिष्ठ वकील बेनी चटर्जी के माध्यम से कहा कि जैन धर्म के विभिन्न पहलुओं को नगर निकायों के समक्ष उजागर किया गया है। हाईकोर्ट ने कहा कि पक्ष-प्रस्तुति में जैन धर्म के सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांतों में से एक अहिंसा पर प्रकाश डाला गया है। याचिका में दावा किया गया है कि पर्यूषण पर्व के दौरान भी वध जारी रहता है, जो जैन धर्म के मूल्यों के लिए हानिकारक है और इससे माहौल खराब हो सकता है।
हाईकोर्ट ने सरकारी वकील पूर्णिमा कंथारिया और नागरिक वकीलों की दलीलें भी सुनीं। हाईकोर्ट ने जनहित याचिका का निपटारा करते हुए बीएमसी और नासिक, पुणे और मीरा-भायंदर के नगर निगमों को पर्यूषण पर्व के दौरान वध प्रतिबंध याचिका पर 30 अगस्त तक फैसला करने का निर्देश दिया। बीएमसी के देवनार बूचड़खाने के महाप्रबंधक डॉ. के. पठान अदालत में मौजूद थे।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसने जैन धर्मार्थ संस्थाओं के दावे के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी नहीं की है और उनकी याचिका पर फैसला नगर पालिकाओं पर छोड़ दिया है।
गौरतलब है कि 31 अगस्त से 7 सितंबर तक पर्युषण पर्व मनाया जायेगा। जैन धर्मावलंबियों की अहिंसा में आस्था केवल मनुष्यों की अहिंसा से कहीं आगे तक फैली हुई है और इसमें सभी जीवों के प्रति सम्मान शामिल है।
बूचड़खानों को अस्थायी तौर पर बंद करने की याचिका पर्युषण-अमारी परवर्तन के मूल कर्तव्य से जुड़ी हुई है, जिसका निर्वहन जैन धर्मावलंबियों को करना चाहिए। याचिका में कहा गया है कि यह सिद्धांत इस विश्वास पर आधारित है कि जब हमारे आसपास मूक प्राणी पीड़ा में डूबे हों, तो आत्मनिरीक्षण और आध्यात्मिक शुद्धि में संलग्न होना संभव नहीं है। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता श्रेयस शाह ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में स्वीकार किया है कि कैसे हजारों साल पहले 9 दिवसीय त्यौहार के दौरान बूचड़खानों की गतिविधियों को निलंबित करने की प्रथा समुदाय द्वारा मांगी गई थी और इसे स्वीकार भी किया गया था।
पर्युषण, जैन धर्मावलंबियों का सबसे महत्वपूर्ण त्योहार है जो गहन ध्यान और अहिंसा के पालन का समय है, जिसमें हर जैन अपनी आध्यात्मिक जागरूकता को गहरा करने और करुणा और न्यूनतम नुकसान के जीवन के प्रति प्रतिबद्धता की तलाश करता है।
Editorial

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