Sharad Pawar
नागपुर। महाराष्ट्र के वन मंत्री सुधीर मुनगंटीवार (Sudhir Mungantiwar) का शरद पवार (Sharad Pawar) पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री बनने का सपना तो जनता के मदद नहीं करने पर तड़ीपार हो गया। पीएम बनना तो दूर गृह मंत्री भी नहीं बन पाये। केवल 7 सीटों के भरोसे कन्याकुमारी से कश्मीर तक का नेता बनने का सपना देखते हैं।
नागपुर में पत्रकारों से चर्चा के दौरान उन्होंने कहा कि मराठा आरक्षण के संदर्भ में शरद पवार, उद्धव ठाकरे और कांग्रेस ने अपनी भूमिका स्पष्ट नहीं की। राज्य सरकार सीधे चर्चा को तैयार है। उन्हें अपनी भूमिका स्पष्ट करनी चाहिए। हम तो जरांगे पाटिल और ओबीसी नेताओं के साथ बार-बार चर्चा कर रहे हैं। मराठा समाज को 10 फीसदी आरक्षण दिया है। मविआ ने आरक्षण के संदर्भ में कोई सकारात्मक निर्णय नहीं लिया। अब तो ओबीसी के बारे में भी अपना रुख स्पष्ट नहीं कर रहे हैं। उसे तो दोनों समाज में विवाद पैदा करना है। मराठा को स्वतंत्र या ओबीसी कोटे से आरक्षण देना है। यह मविआ को स्पष्ट करना चाहिए।
विरोधी चर्चा का कर रहे बहिष्कार
मुनगंटीवार ने कहा कि हम ओबीसी, मराठा समाज के साथ ही विरोधी पार्टी नेताओं को साथ लेकर चर्चा को तैयार हैं लेकिन विरोधी चर्चा का बहिष्कार कर रहे हैं। इस पर भी शरद पवार को अपनी भूमिका स्पष्ट करनी चाहिए। ओबीसी आरक्षण को धक्का न लगाते हुए मराठा समाज को आरक्षण देने की हमारी भूमिका स्पष्ट है।
…तो राऊत को सामना से निकाल देंगे
डीसीएम देवेन्द्र फडणवीस को संजय राऊत ने अगर नायक कह दिया तो उद्धव ठाकरे उन्हें अपने अखबार सामना से बाहर निकाल देंगे। राऊत शरद पवार के नहीं, उद्धव ठाकरे के हैं। यह साबित करने के लिए अनेक बार बोलते हैं। राऊत को पवार भक्त होने के बाद भी ठाकरे को अधिक महत्व देते हुए अपनी भूमिका रखनी पड़ रही है अन्यथा मातोश्री से बाहर जाना पड़ेगा।
सत्ता के लिए जाति की सीढ़ी बना रहा विपक्ष
वन मंत्री ने कहा कि चुनाव उम्मीदवार और राजनीतिक पार्टी की कार्यक्षमता के आधार पर होना चाहिए न कि जाति के आधार पर। विपक्ष जाति की सीढ़ी का उपयोग कर सत्ता पाने का प्रयास कर रहा है। यह राजनीति के लिए खतरे की घंटी है। उन्होंने कहा कि निश्चित रूप से हम लोकसभा चुनाव में सतर्क नहीं रहे और विपक्ष ने झूठा नैरेटिव सेट किया। जनता को विपक्षियों के ऐसे झूठे प्रचार की बलि न चढ़ते हुए सच क्या है यह समझना चाहिए। यह अपील भी उन्होंने की।
Editorial

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