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इस्लामाबाद (एजेंसी)। इमरान खान (Imran Khan) की पार्टी पीटीआई (PTI) पर बैन का आह्वान करके शहबाज शरीफ (Shahbaz Sharif) ने अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मार दी है। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के कुछ सीटों पर पीटीआई के समर्थन में लिए फैसले ने शरीफ सरकार को बैचेन कर दिया था। अब शरीफ सरकार की नई मुश्किल यह है कि पीटीआई को बैन करने में उसकी अपनी गठबंधन सरकार के अन्य सहयोगी उसे मदद करने से साफ इनकार कर रहे हैं। शरीफ सरकार के कुछ सहयोगी दलों ने इसे अलोकतांत्रिक फैसला करार दिया है। साथ ही चेतावनी भी दी कि इस फैसले को लागू करने के दूरगामी असर देखने को मिल सकते हैं।
पाकिस्तान (Pakisthan)
सरकार ने सोमवार को इमरान खान की पार्टी पर आरोपों की झड़ी लगा दी। शहबाज शरीफ की सरकार ने पीटीआई पर गैर कानूनी तरीके से विदेश से चंद्र लेने, दंगों में संलिप्त होने और कथित तौर पर तालिबान को देश के अंदर घुसाने के लिए 'राष्ट्र विरोधी होने का आरोप लगाया। इन आरोपों के साथ सरकार ने पीटीआई पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा की थी। पाकिस्तान मुस्लिम लीग- नवाज (पीएमएल-एन) नीत सरकार ने 71 वर्षीय खान और पूर्व राष्ट्रपति अरिफ अल्वी सहित अन्य पर देशद्रोह का मुकदमा चलाने की भी चेतावनी दी है।
शहबाज ने अपने पैरों ਪਦ ਵੀ ਸਾਦੀ शरीफ सरकार के इस कदम को उसके सहयोगी दलों ने 'हताशा में उठाय गया कदम बताया है। साथ ही संघीय प्रशासन में हड़बड़ाहट का संकेत बताया। पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी)
(Pakistan People's Party (PPP))
, अवामी नेशनल पार्टी (Awami National Party), जमीयत उलेमा ए इस्लाम (Jamiat Ulema-e-Islam) और जमात ए इस्लामी जैसे दलों ने भी इस फैसले की आलोचना की है। पूर्व विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो जरदारी नीत पीपीपी ने इस विवादित कदम से किनारा कर लिया है। पार्टी ने कहा कि खान की पार्टी पर प्रतिबंध लगाने से पहले उससे चर्चा नहीं की गई।
अपनों ने भी छोड़ा साथ केंद्र में पाकिस्तान मुस्लिम लीग- नवाज (पीएमएल- नीत) सरकार में सहयोगी पीपी की सूचना सचिव शाजिया अता मारी ने कहा कि उनकी पार्टी पीटीआई पर प्रतिबंध को लेकर सरकार से चर्चा करेगी। पीएमएल-एन के पूर्व नेता एवं अवाम पाकिस्तान नाम से अपना दल बनाने वाले शाहिद खाकान अब्बासी ने भी इस कदम पर आपत्ति जताई है। उन्होंने कहा कि सत्तारूढ़ गठबंधन संविधान को समझने में असफल रहा है और बिना सोचे समझे अनुच्छेद- 6 को लागू किया है क्योंकि शासक स्वयं देशद्रोह के मुकदमों का सामना कर रहे हैं।
Editorial

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