India post election politics
हृदयनारायण दीक्षित: विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत की सबसे बड़ी पंचायत संसद के लिए चुनाव संपन्न हुए। सात चरणों में चली इस मैराथन चुनाव प्रक्रिया पर पूरी दुनिया की निगाहें टिकी रहीं। भरी गर्मी के बीच हुए चुनावों में सियासी पारा भी खासा ऊपर चढ़ा हुआ था, पर बंगाल और बिहार जैसे छिटपुट अपवादों को छोड़ दिया जाए तो मतदान शांतिपूर्ण संपन्न हुआ। बंगाल में कायम चुनावी हिंसा राष्ट्रीय चिंता का विषय है। चुनाव प्रचार के दौरान आरोप-प्रत्यारोप का कटुतापूर्ण वातावरण था। राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर विमर्श कम था। विकसित भारत जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे पर भी अर्थपूर्ण बहस नहीं हुई। अर्थनीति पर भी सार्थक विमर्श नहीं हुआ।
अब नई लोकसभा से तमाम उम्मीदें हैं। राष्ट्रीय विमर्श ही भारत की एकता का आधार है। हम भूमडंलीय ताप पर चर्चा करते हैं। हम संवैधानिक दायित्व के निर्वहन में विश्व शांति की कामना करते हैं। हम अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में भारतीय सांस्कृतिक दृष्टिकोण के अभिकर्ता हो जाते हैं। वसुधैव कुटुंबकम भारत की अभिलाषा है। भारत सच्चे अर्थों में लोकतांत्रिक राष्ट्र है। राष्ट्र की रिद्धि सिद्धि और समृद्धि के प्रति लोक प्रतिबद्धता राजनीतिक क्रियाकलापों का केंद्रीय विचार होना चाहिए। आम सहमति के मुद्दे सुस्पष्ट हैं और असहमति के मुद्दे भी। सतत विमर्श, असहमतियों पर चर्चा और राष्ट्रीय मुद्दों पर मतैक्य होना ही चाहिए। राष्ट्रीय विमर्श से देश का आत्मविश्वास सुदृढ़ होता है। राष्ट्रीय एकता अखंडता और सारी दुनिया के प्रति हमारा दायित्व आदि मुद्दे चुनाव के दौरान गहन विचार-विमर्श का विषय बनते तो ज्यादा अच्छा होता। असहमति के मुद्दों पर विमर्श से साझा दृष्टिकोण विकसित होता है।
वाद विवाद और संवाद में भी साझा दृष्टिकोण की जरूरत होती है। जीत को लेकर सबके अपने-अपने दावे और तर्क हैं। नतीजा पूर्व सर्वेक्षणों में राजग भारी बहुमत से आगे है। उनके अनुसार प्रधानमंत्री मोदी तीसरी बार सत्ता संभालेंगे। हालांकि नतीजों से पहले सभी जीतने की बात कर रहे हैं। यह स्वाभाविक भी है। मतदाताओं का जनादेश सबको साथ लेकर चलने की प्रतिभूति होगा। जनता ही बहुमत पक्ष को सत्ता संचालन का जनादेश देती है और जनता ही किसी दल या समूह को प्रतिपक्ष की जिम्मेदारियों के निर्वहन का अवसर देती है। अल्पमत समूह जनता द्वारा खारिज नहीं किया जाता। वह सत्ता पक्ष को लोक कल्याण के सुझाव देता है। सरकार की आलोचना करता है। ब्रिटिश संसदीय परंपरा में विपक्ष को 'प्रतीक्षारत सरकार' कहते हैं। देश के सभी दलों समूहों को जनादेश का सम्मान करना चाहिए। कभी-कभी पराजित दल चुनाव परिणामों को गरिमापूर्वक स्वीकार नहीं करते। वे चुनाव परिणामों को गलत सिद्ध करने के लिए बहानेबाजी करते हैं। ईवीएम का बहाना सर्वविदित है। ऐसी बयानबाजी से चुनाव आयोग जैसी निष्पक्ष संवैधानिक संस्था पर चोट लगती है। जीते-हारे सभी पक्षों को जनादेश का सम्मान करना चाहिए। बेशक लंबे चले चुनाव प्रचार के दौरान व्यक्तिगत आक्षेप से वातावरण तनावपूर्ण है, लेकिन जनादेश का सम्मान सबका कर्तव्य है।
भारत के इतिहास में 14 अगस्त, 1947 की तिथि ऐतिहासिक है। उस दिन संविधान सभा की बैठक मध्यरात्रि के बाद तक चली। उस बैठक में सभा के अध्यक्ष डा. राजेंद्र प्रसाद ने कहा था कि हम सबको आश्वासन देना चाहते हैं कि गरीबी, भूख, बीमारी, शोषण और भेदभाव मुक्त सुंदर जीवन वाला समाज बनाने की अथक कोशिश करते रहेंगे। डा. राधाकृष्णन ने कहा, एक चिर प्रतीक्षा की रजनी के अवसान पर जो भाग्य निर्णायक शुभ घटनाओं से परिपूर्ण है, स्वातंर्त्य सूर्य के दर्शन हो रहे हैं। हम उत्साह के साथ इसका स्वागत करते हैं। उन्होंने अधिकार मोह और भ्रष्टाचार के समूल विनाश की चर्चा की और कहा जब तक हम ऐसा नहीं करते तब तक हम शासन व्यवस्था को समुन्नत नहीं बना सकते। डा. राधाकृष्णन के शब्द आज भी प्रेरक हैं। उन्होंने इसी भाषण में कहा था, सबमें स्वयं को देखना और स्वयं में सबको देखने वाला ही स्वराज पाता है। देश के सभी राजनीतिक कार्यकर्ताओं को संविधान और संविधान निर्माताओं का संकल्प याद रखना चाहिए। उस रात सभी सदस्यों ने एक प्रतिज्ञा पढ़ी। सदस्यों ने प्रतिज्ञा दोहराई। प्रतिज्ञा यह थी, अब जबकि हिंदवासियों ने त्याग और तपस्या से स्वतंत्रता हासिल कर ली है, मैं संविधान सभा का सदस्य स्वयं को हिंदवासियों की सेवा में अर्पित करता हूं, ताकि यह प्राचीन देश संसार में अपना उचित गौरवपूर्ण स्थान पा सके।
संविधान सभा के सभी सदस्यों द्वारा ली गई यह शपथ महत्वपूर्ण है। इस प्रतिज्ञा में भारत को प्राचीन देश कहा गया है, लेकिन भारत के कथित लिबरल और वामपंथी भारत को प्राचीन राष्ट्र नहीं मानते। प्राचीन इतिहास एवं स्वाधीनता आंदोलन में भी भारत प्राचीन राष्ट्र ही माना गया। संविधान निर्माताओं के ऐसे संकल्प और उनकी अभिलाषाएं सदा याद रखने की आवश्यकता है। ऐसे विषयों पर बहस होती रहनी चाहिए। संविधान निर्माताओं ने राष्ट्र को विश्व की महाशक्ति बनाने के लिए ही एक आदर्श संविधान गढ़ा था। इस संविधान में सशक्त कार्यपालिका है, जो विधायिका के प्रति जवाबदेह है। देश के प्रत्येक छोटे-बड़े हिस्से से चुनकर आने वाले सदस्यों से लोकसभा बनती है। न्यायपालिका संविधान की संरक्षक एवं व्याख्याता है ही। अब तक 17 लोकसभा गठित हो चुकी हैं। अधिनियमों का पारण, सरकार को जवाबदेह बनाए रखना और विधायी कार्य के साथ संविधान संशोधन का सुदीर्घ इतिहास है। 18वीं लोकसभा से भी राष्ट्र को ऐसी ही तमाम उम्मीदें हैं।
स्वप्नदर्शी होना अच्छा है। स्वप्नों को यथार्थ में बदलने के लिए परिश्रम करना और अच्छा है। विकसित भारत, शिक्षित और स्वाभिमानी भारत, विश्व के प्रत्येक जन के हित में सोचने वाला भारत, गरीबी मुक्त और स्वस्थ समृद्ध भारत हम 140 करोड़ लोगों का स्वप्न है। देश के प्राचीन इतिहास में सभा समितियों के उल्लेख हैं। ऋग्वेद के अंतिम सूक्त में विचार भिन्नता के बावजूद साथ-साथ चलने एवं परस्पर विमर्शरत रहने की स्तुति है। सबको साथ लेकर सबका साथ-सबका विकास के संकल्प के साथ राष्ट्रीय दायित्व के निर्वहन में सबको जुड़ जाना चाहिए।
Editorial

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