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भगवान ऋषभ के पारणे से बढ़ा अक्षय तृतीया का महत्व - मुनि कमल कुमार
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अक्षय तृतीया (Akshaya Tritiya) जैन धर्म का प्रमुख त्यौहार है। ऋषभनाथ ने तेरह महीने दस दिन की घोर तपस्या का पारणा अपने प्रपोत्र श्रेयांस कुमार के हाथों से इक्षुरस लिया तब से ही बैसाख शुक्ला तीज को लोग बहुत महत्त्व देने लग गए।

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अक्षय तृतीया (Akshaya Tritiya) जैन धर्म का प्रमुख त्यौहार है। ऋषभनाथ ने तेरह महीने दस दिन की घोर तपस्या का पारणा अपने प्रपोत्र श्रेयांस कुमार के हाथों से इक्षुरस लिया तब से ही बैसाख शुक्ला तीज को लोग बहुत महत्त्व देने लग गए। मांगलिक कार्य दुकान मकान संस्थान का मुहूर्त ही नहीं विवाह सगाई के लिए भी इस दिन को उपयुक्त माना जाने लगा। और इस दिन को अबूझ मुहूर्त अबूझ सावा भी कहने लग गए।
भगवान ऋषभ इस अवसर्पिणी काल के प्रथम तीर्थंकर थे इसलिए आदिनाथ नाम से भी जाने जाते हैं। भगवान ऋषभ नाभिराज मरुदेवा माता के सुपुत्र थे। उन्होंने सभी को जन्म के साथ जीवन जीने की कला सिखलाई, उसी का ही सुपरिणाम मानता हूँ कि परिवार में दीक्षित होने वालों की संख्या भी भरपूर थी। ज्येष्ठ पुत्र भरत को राज्य देकर ऋषभ दीक्षित हुए। ऋषभ की दीक्षा को सुनकर तीन हज़ार लोग और तैयार हो गए। इस प्रकार दीक्षित होने वालों की एक साथ संख्या बढ़ गई। परंतु लोगों को जानकारी नहीं कि इन साधुओं को आहार कैसे बहराया जाए। जब ऋषभ भिक्षा के लिए जाते तो लोग उन्हें हाथी घोड़ें रत्न आदि उपहार करते परंतु ऋषभ इसे अकल्पनीय समझकर आगे बढ़ जाते। ऋषभ ने दीक्षा के साथ ही मौन साधना प्रारंभ कर दी। लोगों को आहार की जानकारी नहीं थी और इतने बड़े राजा होकर ऋषि बने हैं इसलिए लोग रोटी सब्जी जैसे साधारण पदार्थो लोग की मनुहार भी नहीं करते। ऋषभ पैदल ही भ्रमण करते इसलिए अपने शिक्षित हाथी घोड़े की इसलिए मनुहार करते की बाबा को पैदल नहीं चलना पड़े। परंतु ऋषभ आहार पानी नहीं मिलनें पर भी कभी कम्पायमान नहीं हुए, निरंतर साधना में आगे बढ़ते रहे। ऋषभ के साथ दीक्षित होने वाले तीन हज़ार साधु आहार पानी के अभाव में विचलित हो गए। कोई जटाधारी बन गया, कोई कन्द मूल भक्षण करने लग गया। इस प्रकार तब से ही अनेक मत मतांतर हो गए। परंतु ऋषभ अपने संकल्प पर अडोल रहे।
भगवान ऋषभ के जन्म से पूर्व कल्पवृक्षों के सहारे लोग अपना जीवन यापन करते थे। वृक्ष के फलों का सेवन कर, उदरपूर्ति कर लेते, वृक्षों की छाल से शरीर की सुरक्षा कर लेते। परंतु जब वृक्षों ने फल देने बंद कर दिए तब लोगो के सामने उदरपूर्ति की समस्या आई तब ऋषभ ने ही उन्हें खेती का बोध दिया, फसल तैयार होने पर काटने और अनाज को प्राप्त करने के लिए उन्हें प्रशिक्षण दिया। कटी फसल पर पशुओं को घुमाओ जिससे उनके पैरों के योग से अनाज और फूस अलग हो जायेगा। लोगो ने वैसा ही किया परंतु बैल भी अपनी भूख मिटाने उसे खाने लग गए। लोगो ने सोचा अगर सारा पशू ही चट कर जायेंगे तो हमारा काम कैसे चलेगा। ऋषभ के पास आए और अपनी समस्या रखी। ऋषभ ने समस्या का समाधान देते हुए कहा कि पशुओं के मुँह पर छिंकी बांध दी जाए, जिससे समस्या मिट जाएगी। लोगों ने वैसा ही किया और अनाज तूड़ी रहित हो गया। सबके मन में अनाज को प्राप्त कर ख़ुशी हुई परंतु बैलों की छिंकी खोलना भूल गए। भूख प्यास से व्याकुल बैल छटपटाने लगे। लोगों ने देखा बैल न चारा चर रहे न पानी पी रहे हैं। ऋषभ के पास आकर अपनी समस्या रखी तब ऋषभ ने कहा कि उनकी छिंकी खोली क्या ? लोगों ने कहा वह तो नहीं खोली। ऋषभ ने कहा छिंकी खोले बिना चारा कैसे चरेंगे ? लोग अपने स्थान पर आये और छिंकी खोलते ही बैल पूर्ववत चरने लग गए। उस समय अन्तराय काल ऐसा बंधा कि भगवान ऋषभ को भी तेरह महीना दस दिन घर घर घूमने पर भी आहार पानी का योग नहीं मिला। भगवान ऋषभ सोमप्रभ के सुपुत्र श्रेयांस को मेरु सिंचन का स्वप्न आया और घर में एक सो आठ इक्षु घट की भेंट आई हुई थी। श्रेयांस का सहसा ध्यान गया कि ऋषभ से बढ़कर मेरु पर्वत कौन होगा।भगवान का उधर पदार्पण हुआ और ऋषभ ने शुद्ध प्रासुक इक्षु रस की अर्ज की और भगवान ने अपने अविधज्ञान से देखा कि यह निर्दोष है, मेरे लिए नहीं मंगवाया गया है। उन्होंने श्रेयांस की अर्ज पर ध्यान देकर उसी के हाथों से पारणा किया।
लोग अब समझ गए कि ऋषभ को हाथी घोड़े हीरे पन्ने की आवश्यकता नहीं, शरीर चलाने को शुद्धाहार की आवश्यकता है और सदासदा के लिए समस्या का समाधान हो गया। भगवान ऋषभ की शारीरिक शक्ति इस प्रकार थी कि तेरह महीने दस दिन बिना आहार पानी के निकाल दिए। वर्तमान में दिन में कई बार खाने पीने वाले लोग भी कमजोरी महसूस करते हैं और ताकत की दवाई भी लेनी पड़ती है। फिर भी हम देखते हैं कि भगवान ऋषभ की तपस्या का स्मरण कर हज़ारों लोग एक दिन छोड़कर एक दिन आहार कर वर्षीतप की आराधना करते हैं। भगवान ने तो लम्बे समय तक चौविहार तप तपा वर्तमान में वर्षीतप करने वाले उपवास भी चौविहार कम कर पाते हैं। कई लोग पारणे के दिन रात्रि में पानी आदि ले लेते हैं, उन्हें चाहिए की वर्षीतप की साधना में कम से कम पारणा के दिन भी रात्रि में चौविहार करना चाहिए। इसका प्रारम्भ चैत्र कृष्णा अष्टमी को भगवान ऋषभ दीक्षा दिवस पर किया जाता है और पूर्ण वैशाख शुक्ला तीज को किया जाता है। इस तप का प्रारंभ तेरापंथ समाज में आचार्य तुलसी के शासन काल में हुआ। गत वर्ष आचार्य महाश्रमण के सान्निध्य में इसकी संख्या सर्वोत्कृष्ट कही जा सकती है।

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