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वेदांत में चिंतन की बड़ी महत्ता है, चिंतनशील बनो
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स्वामी गोविन्ददेव गिरि महाराज (Swami Govinda Dev Giri Maharaj) द्वारा छत्रपति शिवाजी महाराज कथा’’ (Chhatrapati Shivaji Maharaj Katha) के तीसरे दिन का शुभारम्भ पतंजलि विश्वविद्यालय प्रांगण स्थित सभागार में हुआ, जहाँ आचार्य बालकृष्ण महाराज (Acharya Balkrishna) ने व्यासपीठ को प्रणाम करते हुए कथा प्रारंभ करने का अनुरोध किया।

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हरिद्वार । स्वामी गोविन्ददेव गिरि महाराज (Swami Govinda Dev Giri Maharaj) द्वारा "छत्रपति शिवाजी महाराज कथा’’ (Chhatrapati Shivaji Maharaj Katha) के तीसरे दिन का शुभारम्भ पतंजलि विश्वविद्यालय प्रांगण स्थित सभागार में हुआ, जहाँ आचार्य बालकृष्ण महाराज (Acharya Balkrishna) ने व्यासपीठ को प्रणाम करते हुए कथा प्रारंभ करने का अनुरोध किया।
कथा में स्वामी गोविन्द देव गिरि महाराज ने बताया कि शिवाजी की बीजापुर यात्रा उन्हें अन्तर्मुख करती गई। वहाँ उन्होंने भवन मंदिरों को देखा, चौराहों पर कटती गायों को देखा, डरे हुए किसानों को देखा, घसीट कर ले जाती हुई ललनाओं को देखा, जिससे उनके मन में काफी कष्ट हुआ। उनके मन में बार-बार यह प्रश्न आता था कि मैं कौन हूँ, मेरा परिवार कैसा है, मेरा समाज कैसा है, मेरा राष्ट्र क्या है? मेरे कुल की परंपरा क्या है? उन परंपराओं का पालन हो रहा है या विध्वंस हो रहा है? जीजा माता उन्हें बार-बार कहती थीं कि इस पर विचार करते रहो। इस प्रकार चिंतन करना ही सबसे बड़ा चिंतामणि होता है। वेदांत में चिंतन की बड़ी महत्ता है, वहाँ भी तो चिंतन किया जाता है जो जीवन को पूर्णतः बदल देता है। माता जीजा बाई के दिए संस्कार ही थे जो उन्हें अपने देश, समाज व राष्ट्र के प्रति जागरूक रखते थे।
इस अवसर पर आचार्य बालकृष्ण महाराज ने कहा कि छत्रपति शिवाजी महाराज की कथा पतंजलि विश्वविद्यालय से प्रवाहित हो रही है। उन्होंने कहा कि स्वामी रामदेव महाराज के तप, पुरुषार्थ और शुभ संकल्प से पतंजलि के रूप में यह पवित्र, विशाल एवं दिव्य-भव्य संस्थान निर्मित हुआ है।

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