Pratahkal-Pune-Acharya Mahashraman,
पुणे । आचार्य महाश्रमण (Acharya Mahashraman) पुणे–अहमदनगर मार्ग पर गतिमान हैं। मंगलवार प्रातः आचार्यश्री ने रांजणगांव से प्रस्थान किया। कोरेगांव में जैन समाज ने उनका स्वागत किया। लगभग 11 किमी विहार कर वे सरदवाड़ी में प्रवास हेतु पहुंचे। उनका प्रवास यहीं हुआ। यहाँ प्रवचन में उन्होंने कहा कि मानव जीवन पाकर भी जो व्यक्ति धर्म नहीं करता व इस जीवन को यूं ही गँवा देता है, वह अपने हाथ में आये चिंतामणि रत्न समान इस जन्म को खो देता है। न जाने फिर कब यह मानव जीवन मिलेगा, इसे सार्थक करने का प्रयास होना चाहिए। आचार्यश्री ने आगे कहा कि विद्या विनय से सुशोभित होती है। अतः जरूरी है कि विद्यार्थी ज्ञानवान बनने के साथ विनयवान भी बनें। ईमानदारी एक सर्वोत्तम नीति है यह भाव सबके भीतर में होना चाहिए। इस अवसर पर मुंबई से चातुर्मास प्रवास समिति अध्यक्ष मदन तातेड सहित पदाधिकारियों ने मुंबई प्रवास की स्मारिका भेंट की।

Editorial

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