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आत्मा की शुद्धि का साधन है ईमानदारी
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कोंकण (Konkan) की यात्रा के दौरान गुरुवार को प्रातः आचार्य महाश्रमण (Acharya Mahashraman) ने अपनी धवल सेना के साथ माणगांव (Mangaon) से प्रस्थान किया। लगभग ग्यारह किलोमीटर का विहार कर आचार्यश्री लोणेर गांव के बाहरी भाग पहुंचे। यहाँ प्रवास स्थल के समक्ष आयोजित प्रवचन में उपस्थित जनता को पाथेय प्रदान करते हुए उन्होंने कहा कि जैन (Jain) वाङ्मय में महाव्रत और अणुव्रत की बात बताई गई है। महाव्रत का अनुपालन साधु करते हैं तो गृहस्थों के लिए अणुव्रत के नियम पालनीय होते हैं। गुरुदेव तुलसी के समय अणुव्रत को व्यापक रूप

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मुंबई। कोंकण (Konkan) की यात्रा के दौरान गुरुवार को प्रातः आचार्य महाश्रमण (Acharya Mahashraman) ने अपनी धवल सेना के साथ माणगांव (Mangaon) से प्रस्थान किया। लगभग ग्यारह किलोमीटर का विहार कर आचार्यश्री लोणेर गांव के बाहरी भाग पहुंचे। यहाँ प्रवास स्थल के समक्ष आयोजित प्रवचन में उपस्थित जनता को पाथेय प्रदान करते हुए उन्होंने कहा कि जैन (Jain) वाङ्मय में महाव्रत और अणुव्रत की बात बताई गई है। महाव्रत का अनुपालन साधु करते हैं तो गृहस्थों के लिए अणुव्रत के नियम पालनीय होते हैं। गुरुदेव तुलसी के समय अणुव्रत को व्यापक रूप मिला। सद्भावना, नैतिकता और नशामुक्ति- इन तीन सूत्रों में मानों अणुव्रत के सारे नियम समाहित हो जाते हैं। इसमें नैतिकता की बात बताई गई है। आदमी को अपने जीवन में ईमानदारी के रास्ते पर चलने का प्रयास करना चाहिए। जीवन में नैतिकता हो, ईमानदारी के भाव होते हैं तो आत्मा भी शुद्ध बनी रह सकती है। अपना कार्य क्षेत्र में भी ईमानदारी हो। न्याय पाने के लिए भी आदमी को ईमानदारी के मार्ग पर चलने का प्रयास करना चाहिए। किसी को झूठे आरोप में फंसाने से, झूठ बोलने से बचने का प्रयास करना चाहिए। दुकानदारी में भी ईमानदारी हो, आदमी बेइमानी से बचने का प्रयास करे। जीवन में ईमानदारी बनी रहे तो आत्मा की शुद्धि हो सकती है।

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