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इंटरनेट मीडिया इंफ्लूएंसर चुनाव अभियान के नए सितारे
By EditorialPublished on
नई दिल्ली (एजेंसी)। अभी चुनाव की घोषणा भले ही नहीं हुई हो, पर इंटरनेट मीडिया (Internet Media) पर चुनाव का रंग चढ़ने लगा है। आम तौर पर हम वाट्सएप, इंस्ट्राग्राम, फेसबुक, एक्स (ट्विटर) व रील पर प्रत्याशियों के वीडियो देखते हैं

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नई दिल्ली (एजेंसी)। अभी चुनाव की घोषणा भले ही नहीं हुई हो, पर इंटरनेट मीडिया (Internet Media) पर चुनाव का रंग चढ़ने लगा है। आम तौर पर हम वाट्सएप (What's App), इंस्ट्राग्राम (Instagram), फेसबुक (Facebook), एक्स (Twitter) व रील पर प्रत्याशियों के वीडियो देखते हैं, उनके बारे में पढ़ते हैं, लेकिन इस बारे में ध्यान नहीं देते हैं कि कौन इन वीडियो को बना रहा है और कौन आपके फोन तक को इन जानकारियों पहुंचा रहा है।
आपसे फेसबुक, ट्विटर पर पूछा जाने लगता है कि आपके इलाके के लिए कौन हो सकता है सबसे अच्छा उम्मीदवार । असल में यह सारा काम करते हैं इंटरनेट मीडिया इंफ्लूएंसर, जिनकी इन दिनों भारी मांग दिख रही है। राजनीतिक पार्टियों से लेकर राजनेता तक इन दिनों इन्हें ढूंढ़ रहे हैं। ये पार्टी की बैठकों में बुलाए जा रहे हैं। नेता इन पर लाखों रूपये खर्च करने के लिए तैयार हैं। उन्हें पता है कि इंफ्लूएंसर व इंटरनेट मीडिया का जादू वोटर को उनके पक्ष में कर सकता है। तभी इन दिनों पब्लिक रिलेशन (पीआर) का काम करने वाली कंपनियां इंटरनेट मीडिया का ज्ञान रखने वाले युवाओं को पार्ट टाइम के लिए भर्ती कर रहे हैं। उन्हें ट्रेनिंग दे रहे हैं कि कैसे इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म पर उन्हें प्रत्याशी के पक्ष में अभियान चलाना है। कैसे उन्हें इंटरनेट मीडिया पर नकली अकाउंट बनाना है और नेता के पेज की लाइकिंग कैसे बढ़ाना है।
सोशल मीडिया पर पकड़ बनाने की कवायद
नेता भी समझ चुके हैं कि चुनाव में इंटरनेट मीडिया से आउट होने पर वे मैदान से आउट हो सकते हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह है कि भारत में एक अरब से अधिक लोगों के पास मोबाइल फोन है और उतने ही लोग इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं। इधर, इंटरनेट सस्ता भी हुआ है, जिससे लोगों की उस तक पहुंच बढ़ी है। इसका केवल स्थानीय स्तर पर इस्तेमाल होने से प्रत्याशियों का खर्च भी कम हो जाता है।
इंफ्लूएंसर अपने फालोअर के हिसाब से लेते हैं रूपये
पीआर कंपनियां भी इंफ्लूएंसर को हायर करती हैं। इंटरनेट मीडिया पर पांच हजार से लेकर एक लाख फालोअर वालों की मांग अधिक है। पांच से 25 हजार फालोअर वाले को स्थानीय स्तर के मुद्दों को उजागर करने के लिए हायर किया जाता है। बताया जाता है फेसबुक व वाट्सएप पर अब इस तरह का अभियान चलाया जा सकता है, पर वोटर को यह पता नहीं होता है कि इसके पीछे क्या कहानी है।
नेता के चुनाव क्षेत्र तक ही सीमित रखने को पिनकोड के हिसाब से कंटेंट को बाजार में स्प्रेड (फैलाया) किया जाता है। इंफ्लूएंसर का कोई निर्धारित शुल्क नहीं होता है। अपने फालाअर के हिसाब से रूपये लेते हैं। जो उम्मीदवार इंटरनेट मीडिया पर कम या सक्रिय ही नहीं होते हैं, उनसे अधिक चार्ज किया जाता है।

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