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लोगों को खूब पसंद आई मेवाड़ के चाय वालों के इतिहास की दास्तान
By EditorialPublished on
बीते शुक्रवार को दैनिक प्रातःकाल (pratahkal) में मुंबई में 110 वर्षों से चाय का व्यापार कर रहे मेवाड़-वागड़ ( Mewar-Wagad) के लोगों पर एक फीचर स्टोरी प्रकाशित की गई थी। प्रकाशन के बाद चाय के व्यापार से जुड़े हुए नए पुराने तमाम पाठकों ने प्रातःकाल में संपर्क कर चाय वालों के इतिहास को प्रकाशित करने के लिए हृदय से धन्यवाद दिया है। कई लोगों ने नई जानकारियां भी प्रातःकाल के साथ साझा कीं।

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मुंबई। बीते शुक्रवार को दैनिक प्रातःकाल (pratahkal) में मुंबई में 110 वर्षों से चाय का व्यापार कर रहे मेवाड़-वागड़ ( Mewar-Wagad) के लोगों पर एक फीचर स्टोरी प्रकाशित की गई थी। प्रकाशन के बाद चाय के व्यापार से जुड़े हुए नए पुराने तमाम पाठकों ने प्रातःकाल में संपर्क कर चाय वालों के इतिहास को प्रकाशित करने के लिए हृदय से धन्यवाद दिया है। कई लोगों ने नई जानकारियां भी प्रातःकाल के साथ साझा कीं।
अखबार पढ़ कर 50 साल पुराणी यादें जिंदा हो उठी
सागवाडा क्षेत्र (Sagwada area) के पादरड़ी बड़ी गाँव के महेश बी. व्यास ने प्रातःकाल को भेजी अपनी चिट्ठी में बताया कि वह 1972 में मुंबई आए थे। किला कोर्ट क्षेत्र में उनके मामाजी की दुकान पर पिताजी काम किया करते थे। उन्होंने भी अपना काम वहीं शुरू किया। आधा दिन दुकान पर काम करते और आधा दिन स्कूल जाते थे। उस जमाने में मुश्किल से 100 रूपये की तनख्वाह हुआ करती थी। लेकिन इस धंधे की खासियत यह थी कि अनपढ़ आदमी को भी रोजगार मिल जाता था। चाय के धंधे ने वागड़ के क्षेत्र के लोगों को मुंबई में बड़ा सहारा दिया है। आज भी दक्षिण मुंबई में पुरानी होटल जैसे अंबिका टी हाऊस, शंकर विलास, सत्यनारायण होटल, जोशी टी हाऊस मौजूद हैं। मैं 52 साल से मुंबई में हूं। मैं मुंबई छोड़ना चाहता हूं, लेकिन मुंबई मुझे छोड़ती नहीं है। अब वक्त बदल गया है, लेकिन जब प्रातःकाल में स्टोरी पढ़ी तो मेरे मन मस्तिष्क पर 50 साल की पूरी यादें किसी फिल्म की तरह चलने लगी। वाकई में प्रातःकाल प्रवासियों के दिल की पुकार है।
चाय की टपरी से लेकर मंत्रालय तक वागड़ वालों की पकड़
अखबार पढ़ने के बाद मुंबई (Mumbai) में वागड़ सेवा संस्थान के अध्यक्ष नरेंद्र पाटीदार ने बताया कि आलेख में कई कमियां रह गई हैं। उन्होंने बताया कि वागड़ क्षेत्र के लोग चाय की टपरी (tea pot) और दुकान के साथ-साथ मुंबई में कैंटीन व्यवसाय में भी बड़े रूप से सक्रिय हैं। उन्होंने बताया कि मंत्रालय के विभिन्न विभागों की कैंटीन में वागड़ क्षेत्र के लोग बड़ी तादाद में सक्रिय हैं। मंत्रालय के साथ-साथ विभिन्न राजनीतिक दलों के कार्यालयों/धार्मिक ट्रस्टों व कॉलेजों में चलने वाली कैंटीन का संचालन भी वागड़ के भट्ट लोग कर रहे हैं। यह जानकारी आलेख में नहीं दी गई। पाटीदार (Patidar) ने कहा कि इस स्टोरी में बहुत सारे पक्ष पूरी ईमानदारी से लिखे गए हैं। आने वाले दौर में जब कभी मुंबई में वागड़ का इतिहास लिखा जाएगा तो यह स्टोरी महत्वपूर्ण स्रोत होगी।
पानी के व्यवसाय में भी सक्रिय रहे हैं वागड़ के लोग
डूंगरपुर क्षेत्र (Dungarpur area) के एक प्रवासी बुजुर्ग ने बताया कि मुंबई में चाय (Tea) के व्यवसाय के साथ-साथ वागड मेवाड़ के लोग आजादी के पूर्व पानी भरने के व्यवसाय में भी सक्रिय रहे हैं। बुजुर्ग ने बताया कि आजादी के पूर्व दक्षिण मुंबई में पेयजल के लिए लोग कुएं बावड़ियों पर ही निर्भर हुआ करते थे। बिल्डिंगों के रहवासियों के साथ-साथ मंत्रालयों के विभागों में काम करने वाले कर्मचारियों को पीने के पानी की आपूर्ति पीतल और तांबे के घरों में पानी भर के ऊपर की मंजिलों तक पहुंचाने का काम किया करते थे। यह काम मूल रूप से वागड़ क्षेत्र के ब्राह्मण बड़ी मात्रा में करते थे। बाद में जब नल आ गए और पेयजल (Drinking Water) की समुचित व्यवस्था हो गई तो यह व्यवसाय खत्म हो गया। हालांकि दक्षिण मुंबई क्षेत्र में अभी भी यह व्यवसाय जारी है, लेकिन यह अधिकतम मेवाड़ क्षेत्र के ब्राह्मण और प्रजापत समाज के लोग कर रहे हैं। वर्तमान में वागड़ के लोग इस व्यवसाय से किनारा कर चुके हैं।
चाय की दुकान से सरकारी नौकरी तक का सफर
वागड़ के ही एक पाठक ने बताया कि फोर्ट इलाके में चाय की दुकान पर ही वर्षों तक काम करने वाले जेठाणा गांव सागवाडा (डूंगरपुर) के प्रवीण बुनकर इन दिनों मुंबई महानगरपालिका के परमानेंट सरकारी कर्मचारी हैं। बुनकर ए वार्ड में हेल्पलाइन पर कामकाज संभालते हैं। बुनकर की तरह चाय की दुकान के मालिकों के वर्तमान पीढ़ी कई प्रोफेशनल व्यवसाय में सक्रिय भागीदारी निभा रही है।
चाय बेचकर बेटे को बनाया पायलट
बांसवाडा क्षेत्र के शंकर लाल पंड्या ने बताया कि वे 12 साल की उम्र में मुंबई आए थे। चाय का कारोबार शुरू किया और खूब पैसा कमाया। उनके तीन बेटे हैं, जिसमें दो बेटे ऑस्ट्रेलिया में इंजीनियरिंग कर रहे हैं, जबकि एक बेटा मुंबई में पायलट है। उन्होंने पुरानी बातों को ताजा करते हुए कहा कि प्रातःकाल ने हमारी दुखती रग हाथ रख दिया। सच में हमारा कारोबार खत्म हो गया है। नई नवेली फैशनेबल दुनिया में भट्टजी की चाय खत्म सी हो गई है। अब जो लोग बचे हैं उन्हें आधुनिक होना पड़ेगा नहीं तो हमेशा के लिए मुंबई में चाय के क्षेत्र में वागड़ का नाम खत्म हो जाएगा।
मुंबा देवी के पुजारी भी हैं वागड़ के ब्राह्मण
फोर्ट (fort) इलाके में रहने वाले गजानन मेहता ने बताया कि वागड़ मूल के लोगों को भट्ट नाम की उपाधि मराठी समुदाय द्वारा दी गई क्योंकि महाराष्ट्र के कोकण प्रांत की पट्टी के ब्राह्मण समाज को भट्ट के नाम से पुकारा जाता था। वागड़ के लोग विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय हैं। धार्मिक क्षेत्र की बात करें तो मुंबा देवी मंदिर (Mumba Devi Temple), महालक्ष्मी मंदिर (Mahalakshmi Temple) और जीवदानी मंदिर (Jeevdani Temple) विरार के पुजारी के पद पर वागड क्षेत्र के ही ब्राह्मण अपनी सेवाएं दे रहे हैं। फिल्मी दुनिया में असिस्टेंट डायरेक्टर के रूप में सक्रिय वागड़ निवासी पंकज पंड्या के अलावा फिल्म लाइन में भी वागड़ के कई सारे लोग सक्रिय हैं।
राज सिंह डूंगरपुर थे वागड़ के चाय वालों के दीवाने
मशहूर क्रिकेटर डूंगरपुर राजघराने के सदस्य स्वर्गीय राजसिंह डूंगरपुर का पूरा जीवन काल मुंबई में बीता। वागड़ के पुराने लोग बताते हैं कि लोग उन्हें प्यार से बावजी और दरबार के नाम से पुकारा करते। उनका वागड़ के प्रवासियों के साथ बड़ा स्नेह था। फाइव स्टार जिंदगी जीने वाले राज सिंह फुर्सत के क्षणों में चाय वालों के पास आकर बैठा करते थे और उनकी टपरी की चाय पीना पसंद करते थे। मुंबई के कई क्रिकेट क्लब के कैंटीन में उसे दौर में वागड़ वालों को प्रवेश मिला था, जिसके पीछे राजसिंह डूंगरपुर का ही सहयोग था।

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