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फागण लागो ऐ चालो भाया देश में
By EditorialPublished on
इस वर्ष रंगों का त्यौहार (festival of colors) 25 मार्च को है। फागुन ( Phagun) की शुरुआत में ही प्रवासी समाज का मन मदमस्त हो उठता है। मौसम में आया परिवर्तन गांव के खेत खलिहानों की यादें ताजा कर जाता है। नई उमंग और मस्ती में सराबोर हर प्रवासी होली पर अपने घर परिवार, गांव के दोस्तों से मिलने के लिए मचल उठता है और फिर शुरू होता है देश (गांव) जाने का सफर... प्रवासी समाज में होली के साथ आए परिवर्तन पर पढ़ें हमारे रिपोर्टर मनीष पालीवाल की यह रिपोर्ट।
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मनीष पालीवाल
मुंबई। इस वर्ष रंगों का त्यौहार (festival of colors) 25 मार्च को है। फागुन ( Phagun) की शुरुआत में ही प्रवासी समाज का मन मदमस्त हो उठता है। मौसम में आया परिवर्तन गांव के खेत खलिहानों की यादें ताजा कर जाता है। नई उमंग और मस्ती में सराबोर हर प्रवासी होली पर अपने घर परिवार, गांव के दोस्तों से मिलने के लिए मचल उठता है और फिर शुरू होता है देश (गांव) जाने का सफर... प्रवासी समाज में होली के साथ आए परिवर्तन पर पढ़ें हमारे रिपोर्टर मनीष पालीवाल की यह रिपोर्ट।
पुराने दौर की होली...
मुंबई का मारवाड़ी समाज होली (Holi) का पर्व बडे धूमधाम से मनाता आया है। दक्षिण मुंबई हो या उपनगरीय इलाके, तमाम जगहों पर होली के दूसरे दिन धुलेंडी पूरे राजस्थानी रंग के साथ मनाई जाती रही है। दक्षिण मुंबई के विभिन्न सामाजिक व व्यापारिक संगठनों द्वारा किसी धर्मशाला या वाडी में जगह भाड़े पर लेकर रंगारंग कार्यक्रम के साथ होली खेली जाती थी। इसके साथ देशी मारवाड़ी गीत बजाये जाते थे। महिलाओं का समूह भी इन समारोहों में बडी जिंदादिली के साथ सम्मिलित होता था। इस अवसर पर कई व्यापारिक संगठनों द्वारा खास तौर पर गीत गाने वाले फागणिया समूह को बुलाया जाता था। चंग की थाप के साथ खेली जाने वाली होली आज अपना अस्तित्व खो चुकी है। पहले वाला प्रेम अब देखने नहीं मिलता। अब होली वाडी धर्मशाला व समाज के भवनों से निकलकर कॉर्पोरेट रूप ले चुकी है।
होली का मुहूर्त...
इस साल होली (Holi) सोमवार 25 मार्च को खेली जाएगी, जबकि होलिका दहन रविवार 24 मार्च को होगा। 24 मार्च को होलिका दहन का शुभ समय रात 11:13 बजे से रात 12:27 बजे तक है।
खरी बात का दौर गया, इसलिए रिश्तों में खत्म होती मिठास...
होली का पर्व रिश्तों में मिठास पैदा करने वाला पर्व माना जाता है। पहले के दौर में लोग एक मंच पर आकर दो परिवारों/दो दोस्तों या व्यावसायिक दुश्मनी या मनमुटाव को खत्म करते थे। मुंबई (Mumbai) में यह परंपरा कई वर्षों तक देखी गई, लेकिन बदलते दौर के साथ यह परंपरा खत्म होने के कगार पर है, क्योंकि कोई भी खरी बात कह कर दूसरे को नाराज नहीं करना चाहता। दूसरा बिंदु यह है कि अधिकांश मामलों में एकल परिवार होने के कारण परिवारों में बुजुर्ग लोगों की कमी है, जो इस तरह की बातों को सहजता के साथ कर लिया करते थे। इस कारण होली पर होने वाले आपसे समझौते की प्रक्रिया खत्म सी हो गई है।
दुकानों पर आज भी आते हैं फागणिया...
फाल्गुन मास (phalgun month) की शुरुआत के बाद राजस्थान (Rajasthan) के विभिन्न जिलों से विभिन्न जातियों के लोगों का समूह मुंबई अहमदाबाद कोलकाता व दक्षिण भारत के मारवाड़ी बाहुल्य शहरों में पहुँचना शुरू हो जाते हैं। इन समूहों में महिलाओं व पुरुषों का समावेश होता है। यह लोग मारवाड़ी समाज (Marwari society) की दुकानों फैक्ट्री या अन्य व्यावसायिक ठिकानों पर पहुंच कर होली के गीत गाते हैं और बदले में वस्त्र व धन प्राप्त करते हैं। मुंबई में फागण गाने वाले कलाकार कहते हैं कि पहले के जमाने में इनाम बडा मिलता था। दुकान के सेठ हमारी इज्जत करते थे, लेकिन अब युवा पीढ़ी हमें कलाकार की जगह भीख मांगने वाले समझती है। इस कारण हमारे बच्चे इस क्षेत्र में नहीं आ रहे हैं। हालांकि अब भी कद्रदानों की कमी नहीं है, लेकिन पहले वाली बात भी नहीं है।
होली और वस्त्र परिवर्तन ....
फाल्गुन के आते ही मौसम के परिवर्तन के साथ वस्त्रों मे भी परिवर्तन आ जाता है। मुंबई में भी फागण महोत्सव में लोग मौसम अनुसार कपड़े पहने नजर आते हैं। इतिहासकार श्रीकृष्ण जुगनू बताते हैं कि राजस्थान में वस्त्र-प्रसंग में यह बात विशेष रूप से याद आती है कि यहां ऋतु आधारित परिधान की परंपरा रही है। कोई दो सौ साल पहले लिखी "कपड़ कुतूहल" में इस मान्यता पर जोर है कि रुचि की अनुकूलता पर ऋतु का प्रभाव होता है। जुगनू बताते हैं कि पुराने गीत में कहा गया है कि
आयो फागुन,लागो फागुन, मन भायो फागणियो।
लाल कोर को,बूंद बोर को, लचचायो फागणियो।।
वह कहते हैं कि यह बड़ा सच है कि नारी मन की लालसाओं में लालित्य के दर्शन के मूल में कमनीयता और रमणीयता का जो महत्व है, वह परिधानों को भी पहचान देता है। सावन में लहरदार लहरिया की तरह फागुन में फबते फागणिया परिधान को ओढ़ने की परंपरा है। यह ओढ़ने से ओढ़नी और कोरदार होने से कोरणी भी है। पूरा आंगन धुला सफ़ेद झक्क और कोरों-कोणों पर कंचों की तरह बूंदे या फिर चौकोर- चौकोर लूमक-झूमक करती लड़ियां और अंत में गोटे की घुटाई वाली तुरपाई। नवेली ओढ़े तो सास टचकारी करती, बलैयां लेती बोले : कजरा लगाना मत भूलना ! जब तक बहू पर सासरे का रंग पूरा न चढ़ जाए, तब तक तरह-तरह के रंग चढ़ाए जाते हैं। पीहर का पीला, मामैरा का कोरजल्या, बुआ की बुरलिया-ओढ़नी, जेठाणी का जेठा वेश और ननद का ननदिया नांदन। भतीजा-भतीजी होने पर ढूंढ की रस्म का रुचिकर वेश ! सच में कितने रंग है जीवन के। शायद इन रंग मिजाज़ के कारण ही वह मिजाजण होती है। यह तमाम परम्परा आधुनिक रुप में मुंबई मे जीवंत है।
ढूंढोत्सव की रोचक रस्में और परम्पराएं
मुंबई या देश के किसी भी हिस्से में रहने वाले प्रवासी मारवाड़ी समाज द्वारा जिस घर में बेटे का जन्म होली के पहले होता है, वहां यह ढूंढोत्सव (dhoondhotsav) की रस्म ज़रूर निभाई जाती है। यह रस्म बच्चों के अच्छे स्वास्थ्य व नकारात्मक शक्तियों से बचाने के लिए कि गई एक प्रमुख प्रक्रिया है। ढूंढ की पूजा के लिए बच्चे के मामा कुछ सामान लाते हैं, जिसमें बच्चे के सफ़ेद वस्त्र, मां के लिए पीले वस्त्र (लहंगा-ओढ़नी), सवा सेर फूल, बताशे, मिठाई, सिंघाड़े और नेग शामिल होता है। मां पीहर का पीला लहंगा पहनकर बच्चे को गोद में लेकर लकड़ी की चौकी पर बैठती है। सामने की ओर लकड़ी के पाटे पर एक थाली में सिंघाड़े, बताशे और लड्डू रख कर रोली से छींटा देते हैं। फिर ख़ुद को और बच्चे को तिलक करके सबको धोक देते हैं। घर की महिलाएं मंगल गीत गाती मिठाई बांटती हैं। ढूंढ होली से पहले वाली फागुन की ग्यारस को पूजा जाता है। अब बेटियों के जन्म के उपरांत भी ढूंढ की पूजा होने लगी है। जब तक बच्चे की ढूंढ की पूजा नहीं होती, तब तक बच्चे को मस्तक पर तिलक भी आड़ा ही लगाया जाता है। इस पूजा के बाद ही सीधा तिलक लगाते हैं। मुंबई में रहने वाले प्रवासी मारवाड़ी समाज द्वारा विगत वर्षों में सामूहिक रूप से यह आयोजन करने का रिवाज बढ गया है। मेवाड़ (Mewar) के दिगंबर जैन समाज (Digambar Jain community) द्वारा ढूंढ़ोत्सव का आयोजन भव्य पैमाने पर किया जाता है। ढूंढ़ोत्सव के दौरान रिश्तेदारों को कार्ड भेजकर आंमत्रण दिया जाता है। बुआ व निकट के रिश्तेदार बच्चों के लिए कपड़े लेकर आते हैं। मुंबई के प्रवासी शेखावाटी अंचल के विभिन्न समाजों द्वारा भी यह आयोजन होते हैं, जिसमें अलग अलग परंपरा व रोचकता देखने को मिलती है। कुछ प्रवासी बच्चों की ढूंढ गांव जाकर करते हैं। इस अवसर पर सामूहिक भोज देने की भी परंपरा है।
अब नही दिखती चंग की थाप...
मुंबई के प्रवासी समाज में कुछ वर्ष पहले होने वाले होली आयोजनों में चंग वाद्य यंत्र खूब बजाया जाता था। इसके लिए खासकर राजस्थान से चंग मंगाई जाती थी, लेकिन बदलते दौर में चंग की जगह डीजे या अन्य गीत संगीत ने ले ली है। मस्ती और छेड़-छाड़ भरे लोकगीत उस समय और अधिक सुरीले हो जाते हैं, जब मस्तानों की टोली चंग बजाते झूमती गाती नजर आती थी।
बसों में बढ़ जाती है गांव जाने की भीड़...
होली के 10-12 दिनों पहले से ही गांव जाने वाले लोगों की भीड़ मुंबई के घाटकोपर पनवेल बोरीवली नालासोपारा आदि जगहों पर बढ़ जाती है। इन स्थानों से होकर गांव के लिए ट्रेवल्स जाती हैं। राजस्थान होली मनाने जाने वाले अधिकतर युवा नौकरी पेशा होते हैं, जो अपने सेठ के प्रतिष्ठान के यहां दीपावली का सीजन करने के बाद होली का त्यौहार अपने घर मनाना पसंद करते हैं। राजस्थान जाने वाले युवा एक महीने पहले से ही तैयारी में जुड़ जाते हैं। मेवाड़ क्षेत्र में आज भी रेल सुविधाओं की कमी के कारण लोग बसों पर ही निर्भर हैं। इस कारण सीजन के चलते बस संचालक भी किराए को दुगुना कर देते हैं। इस होली के सीजन में अपने गांव कांकरोली जाने वाले एक युवा सिद्धार्थ ने बताया कि कभी-कभी हमारे मालिक होली पर हमें गांव जाने के लिए मना करते हैं, लेकिन हम हर हाल में अपने गांव जाना पसंद करते हैं। कभी-कभी तो ऐसा भी होता है कि लोग होली पर गांव जाने के लिए अपनी नौकरी तक छोड़ देते हैं। जिन लोगों को लेट छुट्टी मिलती हैं, वह अंतिम समय में होली के एक दिन पूर्व गांव के लिए रवाना होते हैं। धुलेंडी का पर्व अपने परिजनों के साथ मनाते हैं। गांव जाने वाले लोगों में वह परिवार भी सम्मिलित होते हैं, जिनके परिवार में पहली ढूंढ होती है या उनके परिवार में किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद पहली होली होती है।
मस्तानों की टोली पहुंचती है धार्मिक स्थान पर...
होली के दूसरे दिन धुलेंडी के अवसर पर मुंबई के अधिकतर प्रवासी जहां अलग-अलग रूपों में होली पर्व को मानते हैं, वहीं मध्यमवर्गीय लोग धार्मिक स्थान पर जाकर आयोजन करते हैं। मेवाड़ सहित गोड़वाड़ क्षेत्र के अधिकतर नौकरीपेशा लोग मुंबई के तुंगारेश्वर महादेव वसई केलेश्वर महादेव मढ़ आदि इलाकों में पहुंचकर दाल बाटी चूरमा की पार्टी आयोजित करते हैं। स्नान ध्यान के बाद भगवान को भोग लगाया जाता है फिर सभी सामूहिक रूप से पंगत में बैठकर भोजन करते हैं। दाल बाटी चूरमे की यह पार्टियों कई संगठन वर्षों से करते आ रहे हैं।
राजस्थान और ब्रज से खास भांग मंगाई जाती है...
होली का पर्व हो और भांग का जिक्र ना हो, तो बात कुछ अधूरी लगती है। मुंबई के प्रवासी समाज में भांग पीने वाले रसिकों की कोई कमी नहीं है। होली पर मुंबई के राजस्थानी समाज के कई संगठनों द्वारा ठंडाई के साथ भांग बड़ी मात्रा में बनाई जाती है और लोगों को बुला बुलाकर भांग पिलाई जाती है। इन लोगों में एक कंपटीशन रहता है कि किसकी भांग ज्यादा कड़क है। उपनगरीय क्षेत्र के इलाकों में भांग पार्टी के लिए खास तौर पर राजस्थान के नाथद्वारा राजसमंद ब्रज के मथुरा आदि से विशेष भांग मंगाई जाती है। भांग के अंदर बादाम पिस्ता मिलाया जाता है और कहीं-कहीं पर आम रस के साथ भी भंग पिलाने का रिवाज है।
पहले होता था गैर का आयोजन...
मुंबई में वर्षों पहले मेवाड़ क्षेत्र के ब्राह्मण समाज व अन्य जातीय समूह द्वारा गैर नृत्य खेला जाता था। यह आयोजन 1 दिन से लेकर 7 दिन तक चलता था, जिसे देखने के लिए लोग बड़ी दूर-दूर से आते थे। रंग पंचम इसी गैर महोत्सव के दौरान जबरदस्त रूप से मनाई जाती थी। लेकिन अब ऐसे उत्सव कम ही देखने को मिलते हैं। इस प्रकार गोड़वाड़, शेखावाटी और मारवाड़ अंचल के लोगों द्वारा भी स्थानीय परंपरागत नृत्य होली के दिनों में मुंबई में आयोजित करने की परंपरा रही है।

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